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  • Nov 13 2019 10:29PM
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अयोध्या में पूरी ज़मीन हिंदू पक्ष को देने पर लिब्रहान आयोग के वकील ने उठाए सवाल

अयोध्या में पूरी ज़मीन हिंदू पक्ष को देने पर लिब्रहान आयोग के वकील ने उठाए सवाल
अयोध्या में एक साधु
Reuters

बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद वरिष्ठ वकील अनुपम गुप्ता ने राम मंदिर आंदोलन से जुड़े भाजपाई नेताओं लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह और पीवी नरसिम्हा राव से जिरह की थी.

15 साल पहले अनुपम बाबरी ढहाए जाने के मामले की जांच कर रहे न्यायमूर्ति एमएस लिब्रहान आयोग के वकील थे. नई दिल्ली के विज्ञान भवन में उन्होंने भाजपा नेताओं से जिरह की थी. बाद में अनुपम गुप्ता का आयोग से मतभेद हो गया और 2009 में जब आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी तो गुप्ता ने उसकी आलोचना की थी.

बीबीसी के साथ टेलीफ़ोन पर बातचीत में अनुपम गुप्ता ने अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर ज़ोरदार असहमति जताई है और इसकी आलोचना की है.

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सुप्रीम कोर्ट
Getty Images

अनुपम गुप्ता ने अयोध्या केस पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की आलोचना किन बातों पर की?

(1)पूरी विवादित ज़मीन को एक पक्ष (हिंदू पक्ष) को देने का फ़ैसला.

(2) 1528 से 1857 के बीच मस्जिद के भीतर मुसलमानों के नमाज़ पढ़े जाने के सबूत को लेकर सवाल.

(3) दिसंबर 1949 में मस्जिद में मूर्तियां रखकर क़ानून का उल्लंघन करना और पूरी संरचना को दिसंबर 1992 में ध्वस्त किया जाना.

पढ़ें पूरा इंटरव्यू

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से आप कितना सहमत हैं?

यह फ़ैसला शानदार तरीके से इसकी पुष्टि करता है और मैं सहमत हूं कि एक हिंदू मूर्ति क़ानूनी शख़्सियत है. इसलिए, लॉ ऑफ़ लिमिटेशन (परिसीमा क़ानून) एक नाबालिग़ राम लला विराजमान (राम के बाल्य रूप) के मामले में पैदा ही नहीं होता.

विवादित स्थल के नज़दीक खुदाई
BBC

आप फ़ैसले की किन बातों से असहमत हैं?

मैं विवादित स्थल के अंदर और बाहर की भूमि को पूरी तरह हिंदुओं को दिए जाने के फ़ैसले से दृढ़ता के साथ असहमत हूं.

मैं मालिकाना हक़ के निष्कर्ष से असहमत हूं.

यहां तक कि बाहरी अहाते पर हिंदुओं के मालिकाना हक़ और लंबे समय से हिंदुओं के वहां बिना रुकावट पूजा करने की दलीलें स्वीकार कर ली गई हैं, लेकिन अंदर के अहाते पर आया अंतिम फ़ैसला अन्य निष्कर्षों के अनुकूल नहीं है.

कोर्ट ने कई बार यह दोहराया और माना कि भीतरी अहाते में स्थित गुंबदों के नीचे के क्षेत्र का मालिकाना हक़ और पूजा-अर्चना विवादित है.

इसे मानते हुए, अंतिम राहत यह होनी चाहिए थी कि बाहरी अहाता हिंदुओं को दिया जाता. लेकिन भीतरी अहाता भी हिंदुओं को कैसे दिया जा सकता है?

अदालत का इस अहम फ़ैसले पर पहुंचना कि दोनों, भीतरी और बाहरी अहाते हिंदुओं को दिए जाएं, यह कोर्ट के निष्कर्षों के साथ ही मौलिक विरोधाभास है कि सिर्फ़ बाहरी अहाते पर ही हिंदुओं का अधिकार है.

बाबरी मस्जिद
Getty Images

इस फ़ैसले में यह भी पाया गया कि 1528 और 1857 के बीच विवादित स्थल पर नमाज़ पढ़े जाने के कोई साक्ष्य मौजूद नहीं हैं. आपकी राय?

कोर्ट ने इसे आधार माना है और यह मुझे विचित्र लगता है. फ़ैसले में कहा गया है कि मुसलमानों की तरफ़ से इसके कोई सबूत नहीं दिए गए कि 1528 से 1857 के बीच यहां नमाज़ पढ़ी गई. अब भले ही मुक़दमे में साक्ष्यों के अभाव पर फ़ैसला किया गया है, लेकिन यह बात निर्विवाद है कि 1528 में एक मस्जिद बनाई गई जिसे 1992 में ध्वस्त कर दिया गया.

अगर ये मानें कि मुग़ल शासन के दौरान कहीं कोई चर्च, गुरुद्वारे या मंदिर का निर्माण किया गया तो क्या आप उस समुदाय से सैकड़ों वर्षों के बाद यह कहेंगे कि- आपको साबित करना होगा कि आपने वहां पूजा की थी.

भले ही, हिंदू मानते हों कि यह भगवान राम की जन्मभूमि है, लिहाज़ा यह जगह बेहद पूजनीय है. लेकिन हिंदुओं के पास भी इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि- हिंदुओं ने 1528 से 1857 के दरम्यान विवादित भूमि पर पूजा की थी.

लेकिन अदालत के फ़ैसले में 1528 में निर्मित मस्जिद में 1857 में मुसलमान नमाज़ अदा कर रहे थे, यह साबित नहीं हो सका. माननीय अदालत ने यह धारणा किस आधार पर बना ली?

विवादित स्थल के नज़दीक खुदाई
K K MUHAMMED
विवादित स्थल के नज़दीक खुदाई

क्या इस फ़ैसले में दिसंबर 1949 और दिसंबर 1992 की घटनाओं का संज्ञान लिया गया है?

फ़ैसले में 22 दिसंबर 1949 को मुख्य गुंबद के अंदर राम लला की मूर्तियां रखने की घटना का ज़िक्र करते हुए इसे 'मस्जिद को अपवित्र करना' बताया गया, वह अवैध था.

लेकिन नतीजा यह हुआ कि उस पूरी ज़मीन को ही ज़ब्त कर लिया गया. फ़ैसले में यह सही कहा गया है कि 22 दिसंबर 1949 से पहले वहां कोई मूर्ति नहीं थी, फिर भी इस तथ्य ने अदालती निष्कर्ष, धारणा, विश्लेषण या मूल्यांकन को प्रभावित नहीं किया.

अपनी पवित्रता से वंचित किए जाने के इस निष्कर्ष को उसी तरह माना जाना चाहिए जैसे हिंदुओं को विवादित ज़मीन का अधिकार देना. इसका मतलब क़ानून को लाचार किया गया है.

दिसंबर 1992 में मस्जिद ढहाए जाने को यह फ़ैसला क़ानून का उल्लंघन मानता है लेकिन ये बात भावनात्मक, नैतिक या बौद्धिक रूप से कोर्ट पर असर नहीं डालती.

अदालत के सम्मान के साथ, मैं इसे बचाव के योग्य नहीं मानता. यह मूल सैद्धांतिक तथ्य हैं जिन्हें ख़ारिज नहीं किया जा सकता और यह दुखद है.

मेरी राय में, हिंदुओं को समूचे ढांचे का स्वामित्व देना अन्याय करने वाले पक्ष को पुरस्कृत करने जैसा है क्योंकि वे 1949 में मूर्तियों की स्थापना और 1992 में पूरी संरचना को ध्वस्त करने के दोषी हैं.

विवादित स्थल के बाहरी और भीतरी अहाते को हिंदुओं को दिए जाने पर अदालत का तर्क क्या है?

कोर्ट ने अपने फ़ैसले में पूरी संरचना को एक माना है. अगर यह अविभाज्य ज़मीन है जिसका बंटवारा नहीं किया जा सकता था और किसी भी एक पक्ष का इस पूरी ज़मीन पर अकेला स्वामित्व नहीं बन रहा था तो किसी भी पक्ष को इस ज़मीन का हिस्सा नहीं दिया जाना चाहिए.

इस तरह के महत्वपूर्ण मामले में जो सावधानी, निष्पक्षता और संतुलन की आवश्यकता और अपेक्षा की जाती है, सर्वोच्च न्यायालय के पूरे सम्मान के साथ, इस फ़ैसले में उसकी कमी है जो मुझे परेशान करती है.

मेरी राय में अपने इस फ़ैसले में सर्वोच्च न्यायालय धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों और आदर्शों से पीछे हट गया.

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