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aalekh

  • Dec 24 2014 2:52AM

क्षेत्रीय दलों के बिखराव का नतीजा

क्षेत्रीय दलों के बिखराव का नतीजा

झारखंड में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बारे में अनुमान लगाना कोई राकेट साइंस का काम नहीं था. एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे, जो अपनी पार्टी भाजपा की कमियों के बावजूद जनता को लुभा रहे थे, तो दूसरी तरफ अवसादग्रस्त कांग्रेस और आदिवासी वोटों को बांटती क्षेत्रीय पार्टियां थीं. ऐसे में राज्य का चुनावी नतीजा किसी मायने में अप्रत्याशित नहीं है.

       
 नये राज्य के रूप में 14 वर्षो में ही नौ मुख्यमंत्री और तीन बार राष्ट्रपति शासन- एक शासनकाल औसतन 13 महीने का. राज्य मानव विकास सूचकांक में 24वें पायदान पर. भ्रष्टाचार में कई मुख्यमंत्री जेल में हैं, तो कई पर गंभीर आरोप. इन 14 वर्षो में सारे के सारे आदिवासी मुख्यमंत्री बने और अधिकांश समय भाजपा का ही शासन रहा. फिर भी अगर मतदाताओं ने इसी पार्टी को चुना, तो इसे समाजशास्त्र और चुनाव शास्त्र के नये पैमाने पर देखना होगा. पूरे चुनाव के दौरान यह भी संकेत मिलते रहे कि भाजपा अबकी बार किसी आदिवासी को मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं करेगी. फिर मोदी पर मतदाताओं का इतना विश्वास क्यों?
 
इन प्रश्नों के उत्तर जानने के पहले हमें कुछ अन्य तथ्य समझने होंगे. भारत में प्रचलित चुनाव पद्धति- फस्र्ट-पास्ट-द-पोस्ट (एफपीटीपी) यानी एकल संक्रमणीय- की एक बड़ी खराबी है किसी पार्टी के पड़े मतों के प्रतिशत और हासिल हुई सीटों के प्रतिशत में कोई अनुपात नहीं होता. कई बार किसी पार्टी को पिछले चुनाव से ज्यादा मत प्रतिशत मिलते हैं, लेकिन सीटें घट जाती हैं और कई बार मत प्रतिशत कम हो जाता है, फिर भी सीटें बढ़ जाती हैं. आम चुनाव में भाजपा को मत मिले सिर्फ 31 प्रतिशत, लेकिन सीटें 52 प्रतिशत मिलीं. झारखंड में भी यही स्थिति रही है. सीटें जीतने और मत हासिल करने में भाजपा का अनुपात समान नहीं है.
 
यहां दो किस्म के विश्लेषण किये जाते हैं. यह बात सही है कि आम चुनाव में भाजपा को झारखंड के कुल 81 विधानसभा क्षेत्रों में से 56 में बढ़त मिली थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में पार्टी इन सभी सीटों पर जीत नहीं सकी. साथ ही मत प्रतिशत भी आम चुनाव के मुकाबले 13 प्रतिशत कम रहा. लेकिन, तर्कशास्त्र का तकाजा है कि हम तुलनीय के बीच ही तुलना करते हैं और इस आधार पर हमें पिछले विधानसभा में भाजपा की क्या स्थिति रही थी, इसके मुकाबले अबकी बार पार्टी कहां है, यह देखना होगा. और तब हम यह कह सकते हैं कि जहां झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने आदिवासी क्षेत्रों में नरेंद्र मोदी के प्रभाव को काफी हद तक प्रभावहीन किया हैं और वहीं सत्ता में रहने के बावजूद कई आदिवासी नेता चुनाव हारे भी हैं.
 
झारखंड के इस नतीजे का सबसे बड़ा संदेश यह है कि महज आदिवासी नेता होना अब 28 प्रतिशत आदिवासियों का वोट हासिल करने के लिए काफी नहीं रहा. शायद राज्य के आदिवासी आज खुद को कुछ आदिवासी नेताओं द्वारा ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं.
 
एफपीटीपी के सबसे अच्छे परिणाम तब आते हैं, जब एक तरफ एक मजबूत राजनीतिक दल या नेता की स्वीकार्यता हो, तो दूसरी तरफ उतना ही सुगठित विरोधी एकता हो. लेकिन इस विधानसभा चुनाव में या इससे पहले आम चुनाव में भी एक तरफ मोदी एक जबरदस्त जन स्वीकार्यता लेकर मजबूती से उभरे, तो दूसरी तरह उनकी इस स्वीकार्यता को प्रभावहीन करने का कोई विकल्प रहा ही नहीं. अगर कहीं रहा भी, तो वह बंटा रहा. आदिवासी नेताओं की भी अपनी विश्वसनीयता खत्म होती गयी और वे आपस में बंटे रहे, जिसकी वजह से बीते 14 वर्षो में राज्य में अस्थिरता, भ्रष्टाचार और कुशासन का बोल-बाला रहा.
 
झारखंड आदिवासी बाहुल्य (28 प्रतिशत) राज्य है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार यहां औसतन हर छह दिन में एक औरत को, जो मनोविकार से पीड़ित है और जिसे मनो-चिकित्सक द्वारा इलाज की दरकार है, पत्थरों से या अन्य किसी तरह से सामूहिक तौर पर मार दिया जाता है, यह मानते हुए कि वह डायन है और पूरे गांव को खा जायेगी. यानी समाज का एक वर्ग है, जो अब भी चेतना, अपेक्षित जानकारी और तर्क-शक्ति के स्तर पर बेहद नीचे है और लंबे समय से शोषण का शिकार रहा है.
        
झारखंड को अलग राज्य बनाने की मांग एक लंबे समय से चली आ रही थी, जिसे 14 साल पहले अंजाम दिया गया. राज्य में कई आदिवासी नेता उभरे और सत्ता में आये, लेकिन ज्यादातर ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया. आदिवासियों की रोजमर्रा की जिंदगी में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए देश के हर कोने का शोषक यहां पर डेरा डालने लगा. नतीजतन आदिवासियों का प्रतिशत कम होता रहा और राज्य में गरीबी बढ़ती रही.
 
ऐसे में राज्य का राजनीतिक व्यवहार, चाहे शहरी या बाहर से आये वर्ग का हो, या फिर यहां के मूल निवासियों का हो, एक पहेली है. एक तरफ संपन्न शहरी वर्ग और गैर-आदिवासी भी भाजपा या उसके नेता नरेंद्र मोदी को वोट दे और दूसरी तरफ आदिवासियों में भी यही रुझान हो, इसको चुनाव विज्ञान की दृष्टि से समझना कुछ दुरूह कार्य है. इसीलिए यह बड़ा प्रश्न है कि भाजपा बीते 14 वर्षो में ज्यादातर समय शासन में रही और सभी आदिवासी मुख्यमंत्री रहे, फिर भी  जनता ने मोदी पर इतना विश्वास क्यों किया? इसमें कोई दो राय नहीं है कि झारखंड की जनता ने पूरे देश की तरह ही मोदी को भाजपा के नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक परा-पार्टी नेतृत्व के रूप में देखा, यानी पार्टी की कुछ मामलों में बनी नकारात्मक छवि मोदी की छवि को धूमिल नहीं कर पायी. दूसरी ओर जो वर्ग इस पार्टी की कमियों से नाराज था (वह एक बड़ा वर्ग रहा है), उसे यह नहीं समझ में आ रहा था कि वह विकल्प के रूप में आखिर किसे चुने, जो मोदी से बेहतर साबित हो सके. कांग्रेस को पूरे चुनाव के दौरान लकवाग्रस्त पाया गया.
 
दूसरी अन्य पार्टियों में भी बिखराव अपनी चरम पर था. बिहार में नीतीश कुमार ने जहां इस स्थिति को पहचान लिया और इस बिखराव को रोकने तथा सशक्तविकल्प देने के लिए अपने धुर-विरोधी लालू प्रसाद से चुनाव के डेढ़ साल पहले ही हाथ मिला लिया, वहीं झारखंड के गैर-भाजपा नेताओं में यह विवेक नहीं दिखा. कांग्रेस यह कार्य कर सकती थी, लेकिन वह कहीं मरणासन्न अवस्था में कोने में सिमटी दिखाई दी.
 
भाजपा की इस जीत के पीछे संघ का वर्षो का कार्य भी एक नियामक भूमिका में रहा है. उम्मीद है कि अब मोदी और उनकी पार्टी का लक्ष्य होगा राज्य से नक्सलवाद को खत्म करना. और इसके लिए जो भी बल प्रयोग या प्रभावित क्षेत्रों में विकास करना पड़े, वह नयी सरकार करेगी, ताकि देशभर में एक सकारात्मक संदेश जाये और आदिवासी क्षेत्रों में भी संघ अपने प्रभाव को और विस्तृत कर पाये. लेकिन, मोदी की जन-स्वीकार्यता के पीछे का एक कारक और है, जो भूलना नहीं चाहिए. वह यह कि हाल में जहां भी चुनाव हुए हैं, वहां भाजपा शासन में नहीं रही है. ऐसे में इसे एंटी-इन्कम्बेंसी का दंश नहीं ङोलना पड़ा है. इसलिए असली टेस्ट तब होगा, जब भाजपा शासन के बाद इन राज्यों में चुनाव होगा.
 
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