श्रीराम को क्यों कहते हैं भारत की आत्मा, जानें रामनाम का महत्व
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 07 Jan 2024 10:33 AM
अयोध्या में विराजनेवाले भगवान राम निर्बलों के बल ही नहीं, आराध्य और आदर्श भी हैं. श्रीराम का चरित्र त्रेतायुग से लेकर आज के मानवों के लिए समान रूप से प्रेरणाप्रद है. इसीलिए तो राम भारत की आत्मा हैं, प्राण हैं तथा उपास्य हैं. पढ़ें चार विशेष आलेख..
Ayodhya Ram Mandir: सनातन धर्म में आस्था रखने वाले लोगों के लिए साल 2024 का जनवरी माह ऐतिहासिक होने वाला है, क्योंकि इस माह में अयोध्या में बन रहे भव्य राम मंदिर में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा होने वाली है. 22 जनवरी को मंदिर के गर्भगृह में भगवान राम के बाल स्वरूप की मूर्ति प्रतिष्ठित की जायेगी. इसकी तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं. इसे लेकर देश-दुनिया में भक्तों का उत्साह चरम पर है. अयोध्या में विराजनेवाले भगवान राम निर्बलों के बल ही नहीं, आराध्य और आदर्श भी हैं. श्रीराम का चरित्र त्रेतायुग से लेकर आज के मानवों के लिए समान रूप से प्रेरणाप्रद है. इसीलिए तो राम भारत की आत्मा हैं, प्राण हैं तथा उपास्य हैं. त्रेतायुग के रामचरितमानस एवं श्रीमद्भगवतगीता सहित सभी धर्म-ग्रंथों में भगवान के अवतार का उल्लेख मिलता है कि जब-जब धर्म की हानि होती है, पृथ्वी पर अनाचार बढ़ता है, तब-तब कोई दिव्यशक्ति प्रकट होती है और धर्मानुसार विधिक जीवन जीने के लिए उद्यम करती है. धर्मग्रंथों की इस उद्घोषणा को समाज की सबसे छोटी इकाई के रूप में हर मनुष्य अपने ही जीवन-काल को सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग के दायरे में लेकर उस पर गहरी नजर डालें, तो सभी युगों में अधर्मपूर्ण जीवन के दृष्टांत तथा अवतार की अवधारणा बहुत कुछ स्पष्ट हो जायेगी.
त्रेतायुग के मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम का नाम ही आदर्श रूप से जीवन जीने की प्रवृत्ति का नाम है. विष्णु के अवतार लेकर उन्होंने देवता का रूप धारण नहीं किया, बल्कि मनुष्य का रूप धारण किया. मन को वश में करना ही मनुष्य रूप है, वरना हर इंसान ब्रह्मानंद का अंश होता है. भगवान श्रीराम की माता ही नहीं, बल्कि हर मां जब असह्य प्रसव पीड़ा के बाद शिशु को जन्म देती है तो उस वक्त शिशु उसे विष्णु, राम तथा कृष्ण ही दिखाई पड़ते हैं. लेकिन पालन-पोषण धर्मग्रंथों में वर्णित भगवान के पालन-पोषण जैसा हो नहीं सकता, अत: हर मां, माता कौशल्या की तरह शिशु को ईश्वर नहीं, बल्कि बालक रूप में पालित-पोषित करती है. यही कौशल्या ने भी किया तथा श्रीराम से चतुर्भुजी रूप त्याग कर शिशु रूप धारण करने के लिए कहा.
ऋषियों ने अवतारी विभूतियों को चुनौतियों तथा विपरीत हालात में इसलिए भी खड़ा किया, ताकि हर मनुष्य उनसे प्रेरणा ले सके कि जब भगवान का जीवन संकट में पड़ सकता है, तो मनुष्य तो आखिरकार मनुष्य ही है. इससे बड़ी विपरीत स्थिति क्या हो सकती है कि भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम की पत्नी का ही अपहरण हो गया. खुद श्रीराम वन में पत्नी के लिए भटकते हैं और रोते-बिलखते हैं. प्रश्न भी उठता है कि देवाधिदेव महादेव के ईष्ट श्रीराम साधारण मनुष्यों की तरह पत्नी के लिए विलाप कर रहे हैं! भगवान का यह विलाप उन्हें देवत्व की ऊंचाई पर ले जाता है, क्योंकि वे आने वाली पीढ़ी के लिए संदेश दे गये कि अर्धांगिनी की रक्षा के लिए चिंताग्रस्त होना परम आवश्यक है. इस स्थिति में ही परिवार नाम की संस्था की रक्षा की जा सकती है. वैचारिक स्तर पर देखें, तो माता सीता शांति-स्वरूपा हैं. धरती से प्रकट हुई हैं. धरती बिना शांति के नहीं टिक सकती. हिंसात्मक कदमों से न सिर्फ मनुष्य की सत्ता विखंडित होती है, बल्कि प्रकृति भी नष्ट होती है. इसीलिए सीता से विवाह के लिए पिता जनक ने स्वयंवर में शिव के घातक धनुष तोड़ने की शर्त रखी. जनक जी शारीरिक रूप से बलिष्ठ किसी राजकुमार से सीता का विवाह नहीं करना चाहते थे, बल्कि किसी शांति-दूत से पुत्री सीता का विवाह चाहते थे. शिव के धनुष को आज के संदर्भों में परिभाषित किया जाये, तो वह किसी परमाणु-बम से कम नहीं था. जब श्रीराम ने उसको आज के वैज्ञानिक युग के रिमोट पद्धति से तोड़ा था तब भी प्रकृति में हलचल हो गयी थी, लेकिन जनधन की हानि नहीं हुई. यही धनुष किसी अज्ञानी राजा से टूटता तो महाक्षति हो सकती थी. धनुष वजनी नहीं था, क्योंकि इसे खेल-खेल में सीताजी ने कई बार हटाया-उठाया था. वाल्मीकि रामायण के अनुसार, यह आठ पहिये वाले बक्से में बंद था तथा इसमें पांच दरवाजे थे. यह प्रतीक अष्टांग-योग तथा पंच ज्ञानेंद्रियों से भी जुड़ता प्रतीत होता है. इस रूप में भी शांतिस्वरूपा सीता अपहरण को लिया जाये, तो यदि मन की शांतिप्रिय प्रवृत्तियों को भौतिकवाद का रावण अपहृत कर ले, तो सकारात्मक प्रवृत्तियों को बचाने तथा गलत विचारों से रक्षा के लिए श्रीराम जैसा संघर्ष करना चाहिए वरना किसी न किसी दिन नकारात्मक प्रवृत्तियां जीवन को लंका के अधीन कर देंगी.
मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास को योग-शास्त्र में कुंडलिनी जागरण की दृष्टि से भी देखा जा सकता है. योगी इसे जागृत कर दिव्य-पुरुष बन जाते हैं. योग के मनीषियों का कहना है कि मूलाधार चक्र में एक सर्प साढ़े तीन घेरा कुंडली लगाये रहता है. यह जब सुषुप्त रहता है तब व्यक्ति सामान्य व्यक्ति ही रहता है, लेकिन साधना के जरिये जागृत कर लेने पर साधक दिव्य-पुरुष बन जाता है. मूलाधार में कुंडली लगाये सुषुप्त सर्प के सहस्रार चक्र में जाते ही ब्रह्मानंद की अनुभूति होती है. हिंदी साहित्य के शीर्षस्थ विद्वान आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी शब्द सागर में कुंडली के अनेक पर्यायवाची शब्दों में विष्णुजी का भी उल्लेख किया है. इस दृष्टि से कुंडली लगाये सर्प का सहस्रार चक्र में जाने का आशय साधक का रामचरितमानस की चौपाई ‘जे जानई तेहिं देई जनाई, जानत तुम्हहिं तुम्हहिं होई जाई’ जैसी हो जाती है. यानी उसे देवत्व का बोध होने लगता है.
भगवान श्रीराम के जीवन से भारी संबल द्वापर युग में कौरव-पांडव संघर्ष के दौरान दुर्योधन की एकमात्र बहिन दु-शला के प्रति जयद्रथ द्वारा द्रौपदी अपहरण के वक्त पांडवों को मिला था. महाभारत ग्रंथ के वनपर्व में भी 14 अध्यायों में श्रीराम के जन्म से लेकर राज्याभिषेक तक के प्रसंग का उल्लेख है. यह संयोग नहीं, बल्कि यहां भी योग-शास्त्र के कुंडलिनी-जागरण का भाव दिखायी पड़ता है. धृतराष्ट्र पुत्रों द्वारा जंगल में प्रवास कर रहे पांडवों की पत्नी द्रौपदी पर जयद्रथ की नजर पड़ गयी. पांचों पांडव वन में थे और कुटी पर सिर्फ द्रौपदी थी. जयद्रथ ने भी रावण की तरह अतिथि रूप में बलपूर्वक अपहरण किया. जयद्रथ का पीछा कर पांडवों ने द्रौपदी को अपहरण से छुड़ाया. भीम तो जयद्रथ को मार डालना चाहते थे, लेकिन धर्मराज युधिष्ठिर ने जयद्रथ द्वारा दासता स्वीकार करने के वचन पर प्राण-दंड से मुक्त तो कर दिया, लेकिन पतिव्रता द्रौपदी को पर-पुरुष स्पर्श की ग्लानि में अवसाद में आ गये. तब मार्कण्डेय ऋषि ने श्रीराम की पत्नी सीता अपहरण की घटना का उल्लेख किया. युधिष्ठिर ने श्रीराम की संपूर्ण कथा सुनने की जिज्ञासा प्रकट की. युधिष्ठिर में आत्मबल उत्पन्न करने के लिए ऋषि मार्कण्डेय ने पूरी कथा सुनायी. तब युधिष्ठिर को बल मिला. देव-पुरुष वही होते हैं, जो उदाहरणीय होते हैं. श्रीराम के जीवन का उद्धरण आज भी पग-पग पर दिया जाता है, इसलिए राम भारत की आत्मा हैं, प्राण हैं तथा उपास्य हैं.
जब लंका पर चढ़ाई के लिए भगवान राम की सेना पुल बनाने लगी और नल-नील के हाथ ‘राम’ नाम अंकित पत्थर तैरने लगे, तो लंका की सेना में खलबली मच गयी. अपनी सेना का मनोबल गिरने न पाये, इसलिए रावण ने सेनाध्यक्ष से कहा- बस इतनी-सी बात से तुम डर गये. बचपन में खेल-खेल में मैं अपने नाम का पत्थर डालता था, तो वह भी तैरता था. यकीन न हो तो मैं ऐसा करता हूं. उसने ‘रावण’ नाम अंकित पत्थर डाला, तो वह भी तैरने लगा. सेना की बेचैनी दूर हुई. यह जानकारी मंदोदरी को हुई, तो महल लौटने पर इस चमत्कार का राज जानने के लिए वह पूछ बैठी- स्वामी, ऐसा तो पहले कभी नहीं आपने चमत्कार किया था? रावण ने कहा- मंदोदरी, पत्थरों पर तो सच में रावण लिखा, लेकिन समुद्र में छोड़ते समय ‘राम’ को स्मरण किया और पत्थरों से कहता रहा कि ‘तुम्हें श्रीराम की सौंगध, डूबे तो ठीक नहीं होगा’. रावण को मालूम था कि डूबने से बचना है, तो राम का नाम ही एक सहारा है. आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से ‘राम’ सिर्फ नाम नहीं, बल्कि रचनात्मक जीवन का एक सॉफ्टवेयर है, जिसे अपने मन-मस्तिष्क में लोड (अपनाना) करने से जीवन से ही बेड़ा पार होगा.
लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्। कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्। लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्।।
(भगवान राम का नाम स्वयं में महामंत्र है. संकट में इसे जपने से दुख दूर होते हैं.)
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