Bokaro News : बोकारो के जंगलों में एक माह में 150 से अधिक बार लगी आग

सीपी सिंह, बोकारो, फरवरी-मार्च के मौसम को गुलाबी माना जाता है. लेकिन, 2025 में मौसम गुलाबी नहीं होकर गर्मी का रेड अलर्ट दे रहा है. मार्च में ही तापमान 40

सीपी सिंह, बोकारो, फरवरी-मार्च के मौसम को गुलाबी माना जाता है. लेकिन, 2025 में मौसम गुलाबी नहीं होकर गर्मी का रेड अलर्ट दे रहा है. मार्च में ही तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के आसपास तक पहुंच गया. मौसम में आये बदलाव का असर बोकारो की जंगलों में दिख रहा है. फरवरी-मार्च में बोकारो जिला में जंगल में आग लगने की 150 से अधिक घटना हो चुकी है. इसमें 130 घटना को वन विभाग ने काबू पाया, जबकि अन्य आग पर स्थानीय लोगों ने काबू पाया. जिला में अगलगी पर काबू पाने के लिए वन विभाग की छह सदस्यीय छह टीम काम कर रही है. वहीं सेंट्रल कोल फील्ड लिमिटेड की दो टीम का सहयोग भी वन विभाग ले रहा है. सिर्फ झुमरा क्षेत्र में ही एकमात्र आग ऐसी रही, जिसे काबू पाने में 24 घंटा से अधिक का समय लगा. अन्य सभी अगलगी को कुछ घंटा में ही काबू पा लिया गया. विभागीय कर्मियों के पास ब्लोअर समेत आधुनिक तकनीक युक्त मशीन उपलब्ध है. इससे आग पर तुरंत काबू पाया जा रहा है. जानकारों की माने तो 2021 से 2023 के बीच बोकारो जिला में मध्यम घने वन (एमडीएफ) में 47.92 वर्ग किमी की कमी आयी है. हालांकि, बहुत घने वन (वीडीएफ) क्षेत्रों में 34.3 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है. खुले वन क्षेत्र में भी 58.26 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि देखी गयी. मध्यम घने वन में आयी कमी के कारण, जंगल में हवा का प्रवाह तेज हुआ है. साथ ही धूप गिरे हुई पत्तियों को सुखाने में कम समय ले रहा है. ऐसे में हवा की घर्षण से सूखे पत्तियों व जंगली बांस की पत्तियों में आग पकड़ लेता है. वहीं कई लोगों का मानना है कि सड़क किनारे कुछ असामाजिक लोग की ओर से जलता बीड़ी- सिगरेट फेंकने के कारण भी आग फैलता है. वहीं फरवरी से मार्च में जंगल में लगने वाली आग को सीधे तौर पर महुआ से जोड़ दिया जाता है. कारण है कि लगभग इसी समय में महुआ चुनने को लेकर स्थानीय लोग पत्तियों की सफाई के लिए जंगल में सुरक्षात्मक आग लगाते हैं. कई बार यही आग बढ़कर जंगल के बड़े क्षेत्र को चपेट में ले लेता है. दामोदर बचाओ अभियान के गुलाब चंद्र ने बताया कि आग लगने की घटना को महुआ से जोड़ना जिम्मेदारी से भागने जैसा है.

2023-24 में जंगलों में 242 बार लगी थी आग

जिले के जंगलों में हर साल आग लगती है. इस साल अबतक 150 से अधिक बार आग लग चुकी है. जबकि, वर्ष 2023-24 में 242 व 2022-23 में 458 बार आग जंगलों में लगी थी.

क्या होगा नुकसान

जंगल को प्रकृति का फेफड़ा माना जाता है. साथ ही ऑक्सीजन जोन भी. जंगल में आग लगने से सबसे अधिक प्रभाव हवा की गुणवत्ता पर पड़ता है, जो सीधे तौर पर इंसानों के लिए खतरनाक है. इसके अलावा प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र पर भी असर होता है. बोकारो का जंगल प्राकृतिक रूप से कई खाद्य पदार्थ का दाता है. आग इस तंत्र को कमजोर करता है. मिट्टी से उर्वरा शक्ति कम होती है, आर्गेनिक कार्बन, नाइट्रोजन का ह्रास होता है. जिले में छह ऑक्सीजन जोन है. गोमिया प्रखंड का झुमरा व लुगू पहाड़, चंद्रपुरा प्रखंड का सोनाडाली पहाड़ी, नावाडीह का ऊपरघाट वन क्षेत्र, पेटरवार का चरगी वन क्षेत्र, कसमार का हिसिम केदला व जरीडीह प्रखंड का भस्की वन क्षेत्र को जिला का ऑक्सीजन जोन माना जाता है. अगलगी की घटना इसे प्रभावित कर रही है.

जंगल की सुरक्षा सबकी जिम्मेदारी : डीएफओ

डीएफओ रजनीश कुमार ने बताया कि जंगलों में आग लगने की घटना से निपटने के लिए वन विभाग की ओर से पांच स्तर पर तैयारी की गयी है. जंगल में कहीं भी आग लगती है, तो सेटेलाइट से सूचना मिल जाती है. इसके साथ ही आग को बुझाने का कार्य शुरू कर दिया जाता है. जिसमें स्थानीय लोग व समिति का सहयोग भी लिया जाता है. डीएफओ ने बताया कि अगलगी के कई कारण है. इससे प्राकृतिक तौर भारी नुकसान होता है. डीएफओ ने लोगों से अपील की है कि महुआ चुनने के लिए आग नहीं लगाये. महुआ पेड़ के नीचे से सूखे पत्तों को हटाकर भी महुआ चुना जा सकता है. वहीं पेड़ के चारों ओर जाल लगाकर भी महुआ चुना जा सकता है. इससे वन संपदा को नुकसान भी नहीं होगा. जंगल की सुरक्षा सबकी जिम्मेदारी है, आग से जंगल को बचाएं.

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