एसआरएम इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के भाषा, संस्कृति एवं समाज विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर पुल्कित शर्मा का कहना है कि कोरियाई भाषा अब सिर्फ सांस्कृतिक रुचि का विषय नहीं रही. यह शिक्षा, शोध, रोजगार और वैश्विक साझेदारी का मजबूत माध्यम बन चुकी है.
भाषा नहीं, भविष्य का निवेश
आज किसी भी देश के साथ मजबूत रिश्ते बनाने में भाषा की बड़ी भूमिका होती है. अगर छात्र किसी देश की भाषा जानते हैं, तो वहां पढ़ाई करना, रिसर्च करना और लोगों के साथ काम करना काफी आसान हो जाता है.
कोरियाई भाषा भी भारतीय छात्रों के लिए ऐसे ही नए अवसर लेकर आ रही है. इससे छात्र अंतरराष्ट्रीय शिक्षा और वैश्विक करियर की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकते हैं.
भारत में तेजी से बढ़ रही है डिमांड
दक्षिण कोरिया तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और इनोवेशन के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है. वहीं भारत में भी कोरियाई कंपनियों का निवेश लगातार बढ़ रहा है.
ऐसे में कंपनियों को ऐसे युवाओं की जरूरत है जो सिर्फ भाषा ही नहीं, बल्कि कोरियाई संस्कृति और काम करने के तरीके को भी समझते हों. यही वजह है कि कई भारतीय विश्वविद्यालयों में कोरियाई भाषा के कोर्स लोकप्रिय हो रहे हैं.
नौकरी के कई रास्ते खोलती है भाषा
कोरियाई भाषा सीखने वाले छात्रों के लिए करियर के विकल्प भी तेजी से बढ़ रहे हैं. वे मल्टीनेशनल कंपनियों, इंटरनेशनल ट्रेड, ट्रांसलेशन, टूरिज्म, शिक्षा, रिसर्च और डिप्लोमेसी जैसे क्षेत्रों में बेहतर अवसर हासिल कर सकते हैं.
भारत और दक्षिण कोरिया के बीच बढ़ रहे छात्र विनिमय कार्यक्रम और संयुक्त रिसर्च प्रोजेक्ट भी भाषा जानने वाले छात्रों को अतिरिक्त फायदा देते हैं.
भारतीय संस्थान भी कर रहे हैं पहल
देश के कुछ शिक्षण संस्थान इस दिशा में अच्छी शुरुआत कर चुके हैं. एसआरएम इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में बीटेक के प्रथम वर्ष के छात्र अपनी तकनीकी पढ़ाई के साथ कोरियाई भाषा भी सीख रहे हैं.
भाषा, संस्कृति एवं समाज विभाग की विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. एल. कविता नायर के नेतृत्व में यह पहल छात्रों को शुरू से ही अंतरराष्ट्रीय माहौल के लिए तैयार कर रही है. इससे उन्हें आगे चलकर पढ़ाई और करियर दोनों में फायदा मिल सकता है.
आने वाले समय की बड़ी जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि कोरियाई भाषा अब सिर्फ एक वैकल्पिक विषय नहीं रह गई है. यह बेहतर शिक्षा, मजबूत करियर और वैश्विक अवसरों तक पहुंचने का प्रभावी जरिया बन रही है.
अगर भारत को वैश्विक शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बनानी है, तो विदेशी भाषाओं की पढ़ाई को बढ़ावा देना जरूरी होगा. कोरियाई भाषा इस दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है.
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