How to Stop Social Media Addiction: सुबह उठते ही मोबाइल, क्लास के बीच में मोबाइल और रात को सोने से पहले भी मोबाइल. सोशल मीडिया अब सिर्फ टाइमपास का जरिया नहीं रह गया है, बल्कि लाखों छात्रों की पढ़ाई का सबसे बड़ा दुश्मन बनता जा रहा है. रील्स और शॉर्ट वीडियो की दुनिया में इतना समय निकल जाता है कि किताबें खुलने से पहले ही दिन खत्म हो जाता है.
आइए सोशल मीडिया का लत कैया है और इससे झुटकारा कैसे पाना है इसको लेकर कुछ जरूरी टिप्स देखते हैं. कई सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर्स इसके लिए पोस्ट शेयर कर चुके हैं.
Social Media Addiction पर आंकड़े क्या कह रहे हैं?
| आंकड़ा | स्रोत |
| देश में करीब 40 करोड़ बच्चे इंटरनेट का उपयोग करते हैं | NHRC और आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 |
| 76% स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले बच्चे सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं | आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 |
| 18-24 वर्ष के युवा रोजाना 120 मिनट से अधिक सोशल मीडिया पर बिताते हैं | VTION-IAMAI रिपोर्ट 2025-26 |
| भारत में औसत स्क्रीन टाइम करीब 98 मिनट प्रतिदिन है | VTION-IAMAI रिपोर्ट 2025-26 |
भारत सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में पहली बार बच्चों की डिजिटल लत पर एक अलग से हिस्सा जोड़ा गया. सर्वे में साफ कहा गया कि मोबाइल, सोशल मीडिया और स्क्रीन पर बढ़ता समय बच्चों की पढ़ाई, व्यवहार और आगे चलकर काम करने की क्षमता पर बुरा असर डाल रहा है. देश में करीब 40 करोड़ बच्चे इंटरनेट इस्तेमाल कर रहे हैं, और इनमें से 76 प्रतिशत स्मार्टफोन यूज करने वाले बच्चे किसी न किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक्टिव हैं.
दिमाग पर क्या असर पड़ता है?
सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम रील्स और शॉर्ट वीडियो, दिमाग को बार-बार तुरंत मजा देने की आदत डाल देते हैं. इसका सीधा नुकसान होता है पढ़ाई जैसे "धीमे और मेहनत वाले" काम पर फोकस करने की क्षमता पर.
- लगातार शॉर्ट वीडियो देखने से ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कमजोर पड़ती है दिमाग को हर कुछ सेकंड में नई उत्तेजना की आदत लग जाती है, जिससे किताब जैसी "स्लो कंटेंट" बोरिंग लगने लगती है.
- स्टडी सेशन के बीच-बीच में बार-बार फोन चेक करने की आदत बन जाती है, जिससे असल पढ़ाई का समय बहुत कम बचता है.
- लंबे समय तक इस पैटर्न में रहने से याददाश्त और गहराई से समझने की क्षमता पर भी असर पड़ता है
चेन्नई के कॉलेज स्टूडेंट्स पर हुई एक स्टडी में सामने आया कि रील्स भले ही आराम और मनोरंजन का ज़रिया लगते हों, लेकिन इनका ज्यादा इस्तेमाल एकाग्रता, पढ़ाई के समय और आखिरकार नतीजों तीनों पर बुरा असर डालता है.
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App का डिजाइन ही है लत की जड़
इंस्टाग्राम जैसे ऐप जानबूझकर इस तरह डिज़ाइन किए गए हैं कि यूजर देर तक स्क्रॉल करता रहे. इसके कुछ उदाहरण देखें.
- रील्स का इनफिनिट स्क्रॉल - एक वीडियो खत्म होते ही अगली अपने आप शुरू हो जाती है, यूजर को रुकने का कोई नैचुरल पॉइंट ही नहीं मिलता.
- नोटिफिकेशन और लाइक काउंट - हर लाइक, कमेंट या मैसेज पर आने वाला नोटिफिकेशन दिमाग में डोपामिन रिलीज करता है, जिससे बार-बार फोन चेक करने की आदत बनती है.
- FOMO वाली स्टोरीज - "24 घंटे में गायब हो जाएगी" जैसी स्टोरीज यूजर को तुरंत देखने के लिए मजबूर करती हैं, भले ही वो पढ़ाई के बीच में क्यों न हो.
- पर्सनलाइज्ड फीड - एल्गोरिदम हर यूजर की पसंद के हिसाब से कंटेंट दिखाता है, जिससे स्क्रॉल करना छोड़ना और मुश्किल हो जाता है.
अंकुर वारिकू के टिप्स
अंकुर वारिकू के मुताबिक अगर सोशल मीडिया की लत आपकी पढ़ाई, काम या रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डाल रही है, तो इससे बाहर निकलने के लिए किसी मुश्किल प्लान की नहीं, बल्कि कुछ आसान आदतों की जरूरत है. उनका मानना है कि डिस्ट्रैक्शन को सिर्फ मोटिवेशन से नहीं हराया जा सकता, बल्कि उसकी जड़ पर हमला करना जरूरी होता है.
अगर फोन हर कुछ मिनट में आपका ध्यान भटका देता है, तो सबसे पहले उस आदत को कंट्रोल करने का सिस्टम बनाइए. इसके लिए वे तीन आसान लेकिन असरदार तरीके बताते हैं, जिन्हें अपनाकर सोशल मीडिया पर बेवजह बिताया जाने वाला समय काफी हद तक कम किया जा सकता है.
अंकुर वारिकू के 3 आसान टिप्स
- हर ऐप के लिए समय सीमा तय करें: इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर) या अन्य सोशल मीडिया ऐप्स के लिए रोजाना इस्तेमाल की एक तय समय सीमा सेट करें, ताकि जरूरत से ज्यादा समय बर्बाद न हो.
- टाइम लिमिट खत्म होने पर खुद एक्सटेंड न कर सकें: ऐप की लिमिट पूरी होने के बाद उसे बढ़ाने के लिए पासकोड जरूरी रखें, ताकि आप खुद ही समय सीमा बढ़ाकर नियम न तोड़ सकें.
- पासकोड किसी अपने के पास रखें: उस पासकोड का फैसला परिवार के सदस्य या किसी भरोसेमंद दोस्त को करने दें. पासकोड आपके पास नहीं होगा, इसलिए आप सिर्फ जरूरत पड़ने पर ही ऐप का इस्तेमाल कर पाएंगे, बेवजह नहीं.
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