रिम्स के जूनियर डॉक्टर ही लौटा देते हैं जेनरिक दवाएं

Published at :21 Apr 2017 7:41 AM (IST)
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रिम्स के जूनियर डॉक्टर ही लौटा देते हैं जेनरिक दवाएं

रांची : मरीज के परिजनों द्वारा लायी गयी जेनरिक दवाओं काे रिम्स के जूनियर डॉक्टर ही लौटा देते हैं. परिजनों को जेनरिक दवाओं को हटा कर परची पर लिखी ब्रांडेड दवाएं भी लाने को कहा जाता है. परिजन जब सस्ती दवा व उसी काॅम्पोजिशन होने की बात कहते हैं, तो जूनियर डाॅक्टर बीमारी ठीक नहीं […]

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रांची : मरीज के परिजनों द्वारा लायी गयी जेनरिक दवाओं काे रिम्स के जूनियर डॉक्टर ही लौटा देते हैं. परिजनों को जेनरिक दवाओं को हटा कर परची पर लिखी ब्रांडेड दवाएं भी लाने को कहा जाता है. परिजन जब सस्ती दवा व उसी काॅम्पोजिशन होने की बात कहते हैं, तो जूनियर डाॅक्टर बीमारी ठीक नहीं होने का भय दिखाते हैं. सिर्फ जूनियर डॉक्टर का ही नहीं, बल्कि सीनियर डाॅक्टर भी जेनरिक दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हैं. ऐसे में मरीज भ्रमित हाे कर महंगी ब्रांडेड दवा लाने को विवश होते हैं.

बुधवार को एक वार्ड में एक ऐसा ही मामला सामने आया जब मरीज चिकित्सकों की लिखी दवाओं की बजाय जेनरिक दवाएं ले आया. जेनिरक दवाएं देखते ही यूनिट के जूनियर डॉक्टर भड़क गये. उन्होंने परिजन को कहा कि अाप ये दवा कैसे ले आये? जो दवाएं लिखी गयी है, उसे ही लाओ. जूनियर डॉक्टर और परिजन की बात सुन कर सीनियर नर्स आयी और डॉक्टर से कहा कि सर यह बहुत गरीब मरीज है, महंगी दवा का पैसा इसके पास नहीं है. यह सुन कर जूनियर डॉक्टर ने कहा कि इलाज आपको करना है या हमको. हालांकि, नर्स के अड़े रहने पर डॉक्टर साहब ने वही दवा भी मरीज को देने को कहा.
डाॅक्टरों की तय हैं दुकानें, इसलिए नहीं लिखते जेनरिक दवाएं : सूत्रों का कहना है कि कुछ डॉक्टर ब्रांडेड दवाओं की बिक्री का जिम्मा भी उठा लिया है. उन्होंने बरियातू मेडिकल चौके के पास स्थित दवाओं की दुकानें फिक्स कर रखी है. उनकी लिखी दवाएं उन्हीं दुकानों पर मिलती हैं. मरीज के परिजन परची लेकर घूमते रह जायेंगे, लेेकिन उन्हें दवा नहीं मिलती है. बहुत भागदौड़ करने पर एक दवा मुश्किल से मिलती है. अंत में विवश हो कर परिजन उन्हीं दुकानों से दवाएं खरीदते हैं.
समझें, क्या है जेनरिक दवा
वह दवा, जिसमें मॉलिक्यूल यानी केमिकल नाम है, उसे जेनरिक कहते है. वहीं, अगर दवा में किसी प्रकार का नाम आ गया, तो उसे ब्रांडेड कहा जाता है. केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसाेसिएशन के एक अधिकारी ने बताया कि कंपनियां चालाकी करती हैं. वह जेनरिक में कुछ भी नाम से दवा का उत्पादन शुरू कर देती है. इसे ब्रांडेड जेनरिक कहा जाता है. जब बाजार में वह दवा चलने लगती है, तो कंपनी ब्रांडेड का रूप दे देती है.
राजधानी में 12 जगह है ‘दवाई दोस्त’
मरीजों को सस्ती दवा उपलब्ध कराने के लिए राजधानी में दवाई दोस्त 12 जगह अपनी प्रतिष्ठान को खोले हैं. दवाई दोस्त की पहली दुकान नार्थ मार्केट अपर बाजार में खुली थी. इसके बाद गाड़ीखाना चौक, रिम्स, क्लब कॉम्पलेक्स, लेक रोड, करम चौक, सेकेंड स्ट्रीट हिंदपीढ़ी, कांटाटोली चौक, टाटीसिलवे बाजार, सेवा सदन के पास, रातू रोड मेट्रो गली एवं युनूस चौक डोरंडा में है. राजधानी में दवा दुकानों का संचालन चैरिटेबल संस्था की ओर से किया जाता है. इसका उद्देश्य मरीजों को बिना लाभ के दवाएं उपलब्ध कराना है.
ड्रग एंड केमिस्ट एसोसिएशन के महासचिव अमर सिन्हा से बातचीत दुकानदार जेनरिक दवा क्यों नहीं देते हैं?
दवा दुकानदार बिना डॉक्टर के परामर्श के दवा नहीं दे सकते. यह ड्रग एक्ट में अपराध है. डॉक्टर अगर ब्रांडेड दवा लिखता है, तो हम ब्रांडेड ही देते है. वहीं, अगर डॉक्टर जेनरिक लिखता है, तो हम उसे जेनरिक ही देंगे.
क्या दवा दुकानदार जेनरिक दवा बेच कर ब्रांडेड से ज्यादा पैसा कमाते हैं?
अगर कोई दवा दुकानदार ऐसा करता है, तो गलत है. जेनरिक दवा दे रहे हैं, तो उनसे जेनरिक का पैसा ही लें. सामान्य बीमारी में दवा दुकानदार जेनरिक दवा बेच कर निकल सकता है, पर गंभीर बीमारी में परची के हिसाब से दवा देनी पड़ती है.
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