Nepal Floods : बेचैन करने वाली है नेपाल के जलप्रलय की तस्वीर, दूसरी तस्वीर में गाद से सना शव आपको रूला देगा!

नेपाल में बुधवार 26 अगस्त को प्रकृति का कहर कुछ ऐसा बरपा कि इंसान बेबस होकर रह गया. उत्तरी नेपाल के भोटेकोशी नदी में अचानक आई बाढ़ ने कई हंसते-खेलते परिवार को बर्बाद कर दिया और अब स्थिति यह है कि जो मारे गए हैं, उनकी लाश गाद में पड़ी है और जो बच गए हैं, वो अपनों की तलाश कर रहे हैं. उन्हें यह पता नहीं है कि अपनों की लाश मिलेगी या वे जिंदा मिलेंगे, लेकिन उनकी आंखों में अजीब सी बेचैनी साफ दिख रही है.

अब हालात ऐसे हैं कि किसी का अपना गाद में मृत दबा पड़ा है, तो कोई राहत शिविर में बैठकर इस उम्मीद में है कि शायद उसका लापता परिजन लौट आए. उन्हें नहीं पता कि अगली खबर उनके लिए जिंदगी की उम्मीद लेकर आएगी या किसी शव की पहचान के रूप में उनकी दुनिया हमेशा के लिए बदल जाएगी.

त्रिशूली बाजार में गाद से सना शव मिला

जलप्रलय का मंजर जिन इलाकों से गुजर गया है, वहां से आने वाली तस्वीरें आपको रूला सकती है. नेपाल के नुवाकोट जिले में स्थित है त्रिशूली बाजार इलाका. यह त्रिशूली नदी के पास स्थित एक प्रमुख रिहायशी और व्यापारिक कस्बा था. भोटे कोशी और त्रिशूली नदी में अचानक आई विनाशकारी बाढ़ ने त्रिशुली बाजार के कई घरों और पुलों को नष्ट कर दिया है. बाढ़ का पानी यहां से गुजर जाने के बाद त्रिशूली बाजार से एक तस्वीर सामने आई है, जो आपको बेचैन तो करेगी ही रूला भी देगी.


नेपाल बाढ़ : गाद से सना अज्ञात व्यक्ति का शव

इस तस्वीर में एक व्यक्ति नदी द्वारा लाए गए गाद में सना दिख रहा है. उसका शव मिट्टी में सना हुआ है और उसके ऊपर नदी द्वारा अपने साथ लाई गई पेड़-पौधों के टुकड़े नजर आ रहे हैं. सबसे दुखद यह है कि अबतक उस व्यक्ति की पहचान नहीं हुई है और यह भी पता नहीं चल पाया है कि वह किसका अपना है. शायद किसी घर में उसका इंतजार हो रहा हो? शायद कोई पत्नी अपने पति का फोन आने की उम्मीद कर रही हो? शायद किसी बूढ़े मां-बाप की आंखें दरवाजे पर टिकी हों? शायद कोई बच्चा यह पूछ रहा हो कि पापा कब आएंगे? लेकिन इन सवालों का जवाब अभी किसी के पास नहीं है.

रेसक्यू कैंप में बेचैन हैं लोग


नेपाल बाढ़ के पीड़ित, राहत शिविर में अपनों के लिए बेचैन

जलप्रलय के गुजर जाने के बाद जो लोग घर से बेघर हो गए हैं वे लोग रेस्क्यू कैंप में जी रहे हैं और अपनों के लिए बेचैन हैं. उनकी बेबसी यह है कि उन्हें यह नहीं पता कि उनके अपने जीवित हैं या मर चुके हैं. इस वजह से वे बेचारे ना तो रो पा रहे हैं और ना ही अपने बेचैन मन को शांत कर पा रहे हैं. वहीं जिनके अपनों का शव उन्हें मिल चुका है वे बिलख रहे हैं. यही इस बाढ़ की सबसे बड़ी त्रासदी है. राहत शिविरों में बैठे लोग सिर्फ खाने, कपड़े या छत का इंतजार नहीं कर रहे हैं, वे अपने लोगों की खबर का इंतजार कर रहे हैं. हर आती हुई सूचना उनके दिल की धड़कन बढ़ा देती है.

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लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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