India China relations BRICS : साल 2009 में जब BRIC (बाद में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने पर ब्रिक्स) की औपचारिक शुरुआत हुई, तब भारत और चीन ने वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) को मजबूत आवाज देने के लिए हाथ मिलाया था. दोनों देशों ने पश्चिमी प्रभुत्व वाले वित्तीय संस्थानों जैसे IMF और वर्ल्ड बैंक ने समानांतर न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) की स्थापना में बड़ी भूमिका निभाई.
हालांकि, साझा आर्थिक हितों के बावजूद सीमा विवाद और रणनीतिक महत्वाकांक्षांओं ने इस रिश्ते को हमेशा जटिल बनाए रखा.
गलवान तनाव के बाद सीमा पर सेना की वापसी
साल 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में हुई हिंसक सैन्य झड़प के बाद दोनों देशों के राजनीतिक संबंध अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे. कूटनीतिक वार्ताओं के दर्जनों दौर के बाद दोनों पक्षों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर गश्त व्यवस्था (पेट्रोलिंग एग्रीमेंट) और डिसइंगेजमेंट पर सहमति बनाकर सीमा पर शांति बहाली की दिशा में कदम बढ़ाए. ब्रिक्स शिखर सम्मेलनों के साइडलाइन्स ने इस दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व को अनौपचारिक रूप से जुड़े रहने का अवसर दिया.
व्यापार का संतुलन और चीनी निवेश पर भारत का रुख
सीमा पर भारी सैन्य तनाव के बावजूद भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर के पार बना रहा. हालांकि, भारत के लिए भारी व्यापार घाटा (ट्रेड डेफिसिट) चिंता का बड़ा कारण रहा है. भारत ने सुरक्षा चिंताओं के मद्देनजर चीनी मोबाइल ऐप्स पर प्रतिबंध लगाए और एफडीआई (FDI) नियमों को सख्त कर दिया. अब सीधी उड़ानों की बहाली और वीजा नियमों में ढील जैसे फैसलों से दोनों देशों के बीच व्यापारिक आवाजाही और पर्यटन को दोबारा गति मिलने की उम्मीद है.
ग्लोबल साउथ का नेतृत्व और स्थानीय मुद्राओं में कारोबार
ब्रिक्स के मंच पर भारत और चीन के बीच ग्लोबल साउथ के नेतृत्व को लेकर एक मूक होड़ भी देखने को मिलती है. भारत जहां पारदर्शी, नियम-आधारित और लोकतांत्रिक साझेदारी का समर्थन करता है, वहीं चीन अपने आर्थिक प्रभाव के जरिए दबदबा बढ़ाना चाहता है. इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने (डी-डॉलराइजेशन) और स्थानीय मुद्राओं, रुपया और युआन, में सीमा-पार लेनदेन बढ़ाने को लेकर दोनों देश मंच पर एक जैसा आधार तलाश रहे हैं.
