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Tuesday, March 5, 2024

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झारखंड के संताल परगना इलाके में जादुपेटिया समुदाय के कलाकार डोकरा आर्ट में अब भी लगे तो हैं लेकिन उनकी कलाकारी की कीमत कौड़ियों के भाव ही लगाई जाती है, जबकि ग्लोबल बाजार में उनकी कलाकृतियों की कीमत तेजी से बढ़ती जा रही है. उनके गांवों से लौट कर अनुपमा की एक रिपोर्ट : जागुडी […]

झारखंड के संताल परगना इलाके में जादुपेटिया समुदाय के कलाकार डोकरा आर्ट में अब भी लगे तो हैं लेकिन उनकी कलाकारी की कीमत कौड़ियों के भाव ही लगाई जाती है, जबकि ग्लोबल बाजार में उनकी कलाकृतियों की कीमत तेजी से बढ़ती जा रही है. उनके गांवों से लौट कर अनुपमा की एक रिपोर्ट :

जागुडी गांव में पहुंच कर हम सबसे पहले हाकिम जादुपेटिया के घर पहुंचते हैं. वे हमें बैठने को कह कर फिर अपने कामों में लग जाते हैं. देहरी पर बैठी लालमुनी जादुपेटिया भी हमारी ओर ध्यान दिये बगैर ही अपने काम में लगी रहती है. उनके इशारे पर हम वहां लगी खाट पर बैठते हैं, वे अपने काम में मगन हो जाते हैं. उनका यह व्यवहार थोड़ा अजीब और अटपटा लगता है कि दस मिनट बात करके भी तो काम कर सकते थे. क्या नुकसान हो जाता! हमारी हड़बड़ी और उकताहट से उन पर कोई असर नहीं होता. वह मिट्टी पर एक धागे जैसी रस्सी से डिज़ाइन बनाने में इस कदर लीन रहते हैं कि एक बार भी पलट कर हमारी ओर नहीं देखते. करीब दस मिनट में काम से निवृत्त होने के बाद कहते हैं – मुङो माफ कीजिएगा, बीच में काम छोड़ नहीं सकता था, नहीं तो गड़बड़ हो जाता. हाकिम से हमने पूछा कि आप क्या बना रहे थे? उन्होंने कहा कि अभी घुंघूरू का डिजाइन तैयार कर रहे थे. जानती हैं, एक घुंघरू तैयार करने में उस पर 17 बार हाथ को लगाना पड़ता है, तब जाकर तैयार होता है. और तब वह दस रुपये में बिक पाता है. एक बार भी हाथ गलत तरीके से लगा तो वह घुंघरू बेकार हो जाता है.

17 बार हाथ फेरने के बाद बनी कलाकृति की कीमत, मात्र दस रु पये. यह आश्चर्यचकित करनेवाला था. हमने पूछा-ऐसा क्यों? इतनी कम कीमत क्यों?

जवाब होता है- ऐसा क्यों, ये तो नहीं जानता, इसलिए बता भी नहीं सकता, लेकिन इतना मालूम है कि हम एक ऐसी कलाकारी की विधा में लगे हुए हैं, जिसकी मांग तो दुनिया में दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, कलाकृतियों की कीमत भी बढ़ती जा रही है, यहां तक कि हम जहां से कच्ची सामग्री लेते हैं, वहां भी दिन दोगुना-रात चौगुना के हिसाब से महंगाई बढ़ रही है, लेकिन हमारे हुनर का मूल्य एक जगह ठहरा हुआ है.

हम फिर पूछते हैं कि यह स्थिति है तो यह काम करते ही क्यों हैं?

गंभीर किंतु गर्व के साथ उनका जवाब होता है – आदि बुनियादी पेशा है, इसे छोड़ नहीं सकते. इसे छोड़ कर और करेंगे भी क्या? अभी तो इसलिए ज्यादा लगे हुए हैं, क्योंकि 25 दिसंबर से शांतिनिकेतन, बोलपुर में 15 दिनों का मेला लगनेवाला है, वहां कम से कम 15-20 हजार रु पये की बिक्री हो जाए तो दाल-रोटी चले. वैसे हमें यह उम्मीद भी लगी रहती है कि आज अगर दुनिया में हमारी कला के दिवाने बढ़ रहे हैं, इसकी मांग बढ़ रही है, कीमत बढ़ रही है तो कल को शायद हमारे हुनर की कीमत भी बढ़ जाये.

हाकिम ही नहीं, जागुडी गांव में करीब 22 घर जादुपेटिया समुदाय के हैं. सबके घरों के आंगन में उसी तेजी से काम होता हुआ दिखता है. सभी शांति निकेतन के मेले की ही तैयारी में लगे हुए हैं. पैगंबर, मकबूल, अरजीना, प्रह्लाद जादुपेटिया आदि से मुलाकात होती है. किसी के घर में नाक-कान और गले में पहननेवाले आभूषणों की तैयारी है तो कहीं घुंघरू, मूर्ति आदि बनाने का काम दिन-रात एक कर चल रहा है. चलते-चलते हम प्रह्लाद से पूछते हैं कि ये बताइये कि इस कला को जिंदा रखने की जिद्द साल भर में आपलोगों की कितनी कमाई करवा देती है. लागत और कमाई का अनुपात क्या है और कितना मुनाफा कमा पाते हैं? प्रह्लाद का हंसते हुए जवाब मिलता है – यही तो आज तक हमलोगों को समझ नहीं आया या कह सकते हैं कि हम पता करना भी नहीं चाहते. बस दाल-रोटी का जुगाड़ हो जाता है, यही मालूम है.

हाकिम और प्रह्लाद जिस जागुडी गांव के रहनेवाले हैं, वह झारखंड के संताल परगना इलाके में दुमका से करीब 35 किलोमीटर दूर बसा हुआ एक छोटा-सा गांव है. दुमका से दूरी बहुत कम है, लेकिन सड़क की जर्जर हालत इतनी कम दूरी को ही दो-तीन घंटे की यात्र में तब्दील कर देती है और हाकिम जिस जादुपेटिया समुदाय से आते हैं उसके बारे में संक्षिप्त जानकारी यह है कि यह दुनिया का एक अजीबोगरीब समुदाय है. पेशे के तौर पर कई पीढियों से पीतल, मिट्टी, मोम, धूमन (साल के पेड़ से निकलने वाला चिपचिपा पदार्थ), सरसों तेल आदि के मेल से नायाब कलाकृतियों को बनानेवाला हुनरमंद कलाकारों का समुदाय है यह. सामाजिक तौर पर कला को ही मूल धर्म मानने की वजह से हिंदू-मुसलमान-ईसाई धर्म आदि के सम्मिलित स्वरूप वाला समुदाय बन गया है. हालांकि जादुपेटिया समुदाय अपनी कलाकारी से जिन कलाकृतियों का निर्माण करता है, उसे डोकरा आर्ट कहते हैं, जिसकी चमकती हुई मूर्तियां, कलाकृतियां बड़े लोगों (एलीट क्लास)के ड्राइंग रूम में, बड़े समारोहों में स्मृति चिह्न् के रूप में और बड़े शहरों के कला घरों में महंगी कृतियों की श्रेणी में देखी जा सकती हैं.

जागुडी गांव से निकलने के बाद हम वहां से करीब पंद्रह किलोमीटर दूर बसे जबरदाहा गांव में पहुंचते हैं. वहां अलीम अली से मुलाकात होती है. अलीम युवा कलाकार हैं. पिछले साल झारखंड में हुए 34वें राष्ट्रीय खेल के दौरान अलीम और उनके साथियों ने ही राष्ट्रीय खेलों के दौरान प्रतिभागियों को देने के लिए डोकरा आर्ट की कलाकृतियां और राष्ट्रीय खेल के शुभंकर का मेमेंटो तैयार किया था. सरकार के बुलावे पर अलीम अपने गांव और आसपास के गांव के जादुपेटिया समुदाय के करीब पचास लोगों को लेकर झारखंड की राजधानी पहुंचे थे. नईमुद्दीन, रतनी, शंभु, ढुबरी, हारजि, निजाम, ख्वाजामुद्दीन, मुमताज, मदीना, नियामन, ललन, सुखचांद, हिरामन, भानु, खुदीमन, सिहजन, नवाज अली, अबेदीन आदि सब दो माह तक रांची में ही रह कर शुभंकर समेत तमाम कलाकृतियों को बनाते रहे थे. इस कलाकारी के एवज में इन्हें मजदूरी का भुगतान कर सरकारी विभाग ने इन्हें अपने-अपने गांव तक पहुंचा दिया. उसके बाद काम का आश्वासन भी मिला.

लेकिन आज अलीम अपने गांव के पास के ही सरसडंगाल खदान में पत्थर तोड़ने का काम करते हैं और उनके साथी भी मजदूरी करने को मजबूर हैं. अलीम कहते हैं कि फिलहाल तो बोलपुर मेले के लिए हमलोग भी घर में ही कलाकृतियों का निर्माण कर रहे हैं, लेकिन अब यह करने का मन नहीं करता. इस पेशे से परिवार चलना बहुत मुश्किल है. अलीम अपने एक पुराने अलबम को उठा लेते हैं और दिखाते हुए कहते हैं कि देखिए हम शिमला, गुवाहाटी, शिलौंग, चेन्नई, गोवा, कोलकाता आदि सभी जगह जाकर प्रदर्शनी लगा चुके हैं और इसके लिए सरकार हमें मदद देती थी. लेकिन अब सरकार और सरकारी संस्थाओं ने हमारी कला विधा को अपने हाल पर छोड़ दिया है तो प्रदर्शनियां बंद हो चुकी है, इसलिए मजदूरी करने के सिवा हमारे पास और कोई विकल्प भी नहीं है. साल में एक बार शांति निकेतन में मेला लगता है तो वहां के लिए हम सारे लोग अपने-अपने गांव पहुंच कर इस काम को करते हैं, बाकि सालों भर सिर्फ थोड़ा-बहुत (टाक-टूक) काम होता है. जागुडी गांव में प्रह्लाद हमें इस कला के अर्थशास्त्र को इसके नफा-नुकसान को तो नहीं समझा पाये थे लेकिन जबरदाहा में अलीम इसका हिसाब समझाते हैं. वह कहते हैं कि एक बार में हम 30-35 किलो पुराना पीतल पास के बाजार से लाते हैं, जिसकी कीमत लगभग दस हजार रु पये होती है. इतना पैसा हमारे पास होता नहीं, इसलिए हमारे लोग डेढ़ गुना भुगतान के वायदे पर घर का गहना गिरवी रख कर महाजनों से रु पये लेते हैं. दस हजार का पीतल से 20 हजार का माल तैयार आढत में बिकता है. लेकिन महाजन 100 रु पये का 150 रु पये लेता है. तो 15 हजार हमें महाजन को ही देना पड़ता है, शेष जो पांच हजार बचते हैं उसी में हमारी मजदूरी भी होती है, भट्ठी जलाने के लिए कोयला, डिजाइन तैयार करने के लिए मोम, धूमन, सरसों तेल आदि का खर्च भी इसी में शामिल है.

समझ सकते हैं कि क्या अनुपात है हमारी कलाकारी में बचत का! अलीम इतना कुछ बताने के बाद हमें कलाकृतियों के बनने की प्रक्रि या से भी अवगत कराते हैं. पहले पुराने पीतल को लाकर उसे भट्ठी में डाला जाता है. फिर उसे तोड़ कर उसके छोटे टुकड़े या चूर्ण बनाया जाता है. उसके बाद धूमन, सरसों तेल और मोम को मिलाकर एक खास किस्म के धागे का निर्माण करते हैं. उन धागों से मिट्टी पर डिजाइन तैयार किया जाता है. फिर मिट्टी के सांचे पर बने डिजाइन के ऊपर मिट्टी का एक और तह चढाया जाता है और उसके ऊपरी भाग पर एक छोटा-सा छेद छोड़ कर उसके ऊपर पीतल को एक कटोरे नुमा मिट्टी के पात्र में डाल कर उसे भी मिट्टी में ही बंद कर दिया जाता है. ऐसा आकार बनाया जाता है कि पीतल पिघल कर मोम वाले भाग में स्वत: ही पहुंच जाए. फिर उसे भट्ठी में डाल दिया जाता है. भट्ठी की गर्मी से पीतल पिघलकर मोम वाले हिस्से से डिजाइन के चारों ओर फैल जाता है. और तैयार डिजाइन वाला धागा गल जाता है और उसकी जगह पिघला हुआ पीतल ले लेता है. इतनी कवायद करने के बाद इसे गरम रहने पर ही आग से निकाला जाता है और फिर आकृतियों को अलग किया जाता है.

अलीम कलाकृतियों को बनाने की प्रक्रि या को बताते और दिखाते रहते हैं तो साफ लगता है कि यह बेहद ही श्रमसाध्य और बारीक हुनर की कला है. यह उस जमाने की तकनीक भी है, जब कला की कलाबाजियां विशुद्ध रूप से मानव ही किया करता था और मशीन का कोई दखल नहीं होता था.

हम अलीम से यह जानना चाहते हैं कि आखिर क्यों इतनी मेहतन के बाद, इस तरह की नायाब कलाकृतियों के लिए आपको कम पैसे में संतोष करना पड़ता है, जबकि आपकी कलाकृति ही बड़े शो रूम में पहुंच कर ऊंची कीमतों में बिकती है.

अलीम कहते हैं कि बनाने के बाद इसे पॉलिश करना पड़ता है, हमारे गांव में बिजली नहीं थी, तो हम पॉलिश कहां से करते, इसलिए इसे बनाने के बाद इसे पास के बाजार में बेच देते हैं, जहां घुंघरू दस रुपये में, कान और गले का हार 25-30 रु पये में बिक जाता है. वहां हमसे खरीदने वाले भी उसे तुरंत पॉलिश मशीनवाले के पास ले जाते हैं और पॉलिश करवाने के बाद उसकी कीमत 10 से 20 गुणा बढ़ जाती है. अलीम से हम जानना चाहते हैं कि फिर आप खुद ही पॉलिश क्यों नहीं कर लेते? अलीम कहते हैं, अभी तो हमारे गांव में बिजली आयी है, लेकिन अब हमलोगों के पास 60-70 हजार रु पये हो, तब तो पॉलिश मशीन लगवायें, इसीलिए मजबूरी में औने-पौने दाम में आढ़त में जाकर बेचते हैं, क्योंकि महाजन का कर्ज भी प्रतिमाह डेढ़गुणा होता जाता है.

जादुपेटिया समुदाय के दो गांव जागुडी और जबरदाहा में हम डोकरा आर्ट के कई कलाकारों से मिलते हैं. यही जानकारी मिलती है कि इस इलाके में इस समुदाय के लोगों की बसाहट करीब 12 गांवों में हैं. जागुडी, जबरदाहा, बिसरियान, ढेबाडीह, ठाकुरपुरा, सापादाहा, बिसनपुर, खेजुरडंगल, देबापाडा, मुजराबाडी, नावाडीह आदि नाम वाले गांवों में लेकिन जागुडी और जबरडाहा को छोड़ 10 गांव लगभग अपने इस पारंपरिक पेशे से तौबा कर चुके हैं. इन दो गांवों में ही यह कला आखिरी सांस लेते हुए जिंदा बची हुई है.

जादुपेटिया समुदाय और डोकरा आर्ट के बारे में लिखित इतिहास तो उस तरह से नहीं मिलता, लेकिन खुद जादुपेटिया समुदाय का मानना है कि जब से मानवीय समुदाय में श्रृंगार करने की भावना आयी, तब से उनका समुदाय ही इस कलाकर्म में लगा हुआ है. वे आदिवासी समुदाय के बीच बसे हैं, इसलिए ज्यादा उन्हीं कृतियों का निर्माण करते रहे, जिनका इस्तेमाल आदिवासी करते हैं. हालांकि इस समुदाय द्वारा पहले बहुतायत में पईला का निर्माण किया जाता था. पईला कटोरे की तरह होता है, जिसका उपयोग मापक यंत्र की तरह विनिमय प्रणाली में होता रहा है. पईला से ही माप कर व्यापार होता था. अब भी आदिवासी समुदाय में पईला का इस्तेमाल कई जगहों पर होता है. सिदो-कान्हू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ सुरेंद्र झा कहते हैं कि इस समुदाय के बारे में लिखित इतिहास तो कहीं नहीं मिलता, लेकिन यह तय है कि ये घूमंतु समुदाय के लोग रहे हैं और इनकी कलाकृतियों को क्लासिकल ट्राइबल आर्ट की श्रेणी में रखा जाता है. जादुपेटिया समुदाय का कलाकर्म तो क्लासिकल है ही, लेकिन उतना ही क्लासिकल उनकी जीवनशैली भी है, जो कई मायनों में खास और विचित्र भी है. जागुडी और जबरदाहा गांव में जादुपेटिया परिवारों के बीच जाने के बाद इन खास तथ्यों की जानकारी मिलती है. पता चलता है कि पैगंबर जादुपेटिया के बेटे का नाम प्रह्लाद जादुपेटिया है. प्रह्लाद जादुपेटिया ने अपने बेटे का नाम अहमद जादुपेटिया रखा है. हाकिम जादुपेटिया की पत्नी लालमुनी जादुपेटिया हैं. एक ही घर परिवार में निजाम, मदीना, भानु, शंभु जैसे सदस्य मिलेंगे. नाजिर जादुपेटिया ने अपनी बेटी का नाम मरियम रखा है और फिर उसकी शादी एक अंसारी परिवार में की है. तब यह सवाल हम कई लोगों के सामने रखते हैं कि आखिर आप किस समुदाय से आते हैं. हिंदू हैं या मुसलमान तो इसका जवाब सीधा-सीधा कोई नहीं दे पाता. हालांकि कइयों का कहना होता है कि वे मुसलमान ही हैं, लेकिन जागुडी में अब तक कोई मसजिद नहीं है और जबरदाहा में कुछ साल पहले ही एक मसजिद बनी है. हीरामन जादुपेटिया कहती हैं – देवता तो देवता होता है, हिंदू के देवता और मुसलमान के देवता नहीं, हम सभी को मानते हैं. जादुपेटिया समुदाय के कई लोग ऐसा ही कहते हैं कि उन्हें नहीं मालूम कि वे क्या हैं. हालांकि अलीम कहते हैं कि वे लोग मुसलमान समुदाय से आते हैं. यह पूछने पर कि कौन से मुसलमान, अलीम कहते हैं कि पता नहीं देवबंदी भी होता है न एक, वही होंगे शायद. इनकी बातों से लगता है कि इन्हें हिंदू या इसलाम धर्म से ज्यादा लेना देना नहीं, ये अपने मानवीय जीवन और कला कर्म को ही एक समग्र धर्म मान पीढ़ियों से जीवन गुजार रहे हैं.

एक ऐसा विचित्र और खास समुदाय, उनकी खास कला परंपरा को लेकर सरकार चिंतित क्यों नहीं है? क्यों उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया गया है? यही सवाल हम दुमका के उपायुक्त हर्ष मंगला के पास रखते हैं कि क्लासिकल आर्ट के कलाकारों की यह उपेक्षा क्यों और सरकार क्यों इस एक विशेष समुदाय को अपने हाल पर छोड़ कर कला के इस आदि लेकिन आधुनिकतम जमाने में भी पसंद की जानेवाली विधा को सदा-सदा के लिए खत्म कर देना चाहती है. हर्ष मंगला कहते हैं – 250 परिवार इस समुदाय के हैं, उनमें से जो बेहतर हैं, उन्हें झारक्राफ्ट (कला एवं संस्कृति मंत्रलय का एक विंग) से सहयोग मिल रहा है. यह पूछने पर कि क्या इस विकट स्थिति में उबारने के लिए कोई योजना बन सकती है? उपायुक्त हर्ष मंगला कहते हैं – फिलहाल तो कोई योजना नहीं है, जब कोई योजना आयेगी तो उसका लाभ उन्हें दिया जाएगा.

मंगला इत्मीनान से बातें कह देते हैं कि योजना आयेगी तो इनका कल्याण होगा जैसे इस कलाकर्म में लगनेवाली नयी पीढ़ी भी अपने उद्धार के लिए एक अदद योजना के इंतजार में विरासत का बोझ ढोने की गारंटी दे रही हो! और रही बात राजनीतिक दलों की तो संख्या बल में यह समुदाय मुट्ठी भर है, इसलिए इनकी विडंबनाएं राजनीति के गलियारे में कभी मसला नहीं बननेवाली! और तब यह तय-सा लगता है कि शायद कुछ सालों बाद 12 में से बचे दो गांव के जादुपेटिया समाज के लोग भी अपने इस आदि-बुनियादी पेशे से तौबा कर दिहाड़ी मजदूरी करने परदेश जाकर बस जायेंगे, जिसके लिए संताल परगना का इलाका वर्षो से, पीढ़ियों से ख्याति प्राप्त रहा है.

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