कोलकाता. एसआइआर के दौरान चुनाव आयोग के सामने सनसनीखेज जानकारी सामने आयी है. पिछले 23 वर्षों में सीमावर्ती क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में असामान्य वृद्धि हुई है. 2002 से 2025 के बीच मतदाताओं की संख्या में 67.28 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. मतदाताओं की इस असामान्य वृद्धि के आंकड़े सीमावर्ती जिलों के हैं. 23 वर्षों में मालदा में मतदाताओं की संख्या में 95 प्रतिशत, जलपाईगुड़ी में 83 फीसदी और उत्तर व दक्षिण 24 परगना में 72 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. वहीं कोलकाता में मतदाताओं की संख्या में केवल चार प्रतिशत की वृद्धि हुई है. बंगाल में पिछली बार एसआइआर वर्ष 2002 में किया गया था. अब वर्ष 2025 में एसआइआर हो रहा है. इस दौरान राज्य में मतदाताओं की संख्या में किस तरह और किन इलाकों में बढ़ोतरी हुई है, इसे गौर से देखने पर ये आंकड़े सामने आ रहे हैं. 2009-10 में मतदाताओं की संख्या में 4.99 प्रतिशत और 2010-11 में 2.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी. 2002-2009 के बीच मतदाताओं की संख्या में 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई. 2009-2017 में जब वाममोर्चा का दौर खत्म हुआ और तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आया, तब मतदाता वृद्धि दर 21.8 प्रतिशत थी. 2017 से 2025 तक मतदाता वृद्धि दर 12 प्रतिशत रही. अर्थात, इन आंकड़ों को देखें तो स्पष्ट है कि 2002-2025 के बीच मतदाताओं की संख्या में वृद्धि की दर 2009-2017 में सबसे अधिक रही. सीमावर्ती क्षेत्रों में नये मतदाताओं की संख्या में वृद्धि हुई. यहां औसत वृद्धि दर 67.28 प्रतिशत है. उत्तर दिनाजपुर में मतदाता वृद्धि दर दोगुनी से भी ज़्यादा यानी 105 प्रतिशत हो गयी है. कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, मालदा और उत्तर व दक्षिण 24 परगना में मतदाता वृद्धि दर असामान्य दर से बढ़ी है. इस बारे में भाजपा विधायक शंकर घोष ने कहा कि विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी लंबे समय से इसे लेकर सवाल उठा रहे हैं. इस मामले में एसआइआर ही प्रतिरोधक काम कर रहा है. जैसे ज़मीन में कीड़ों को मारने के लिए प्रतिरोधक लगाने पर ज़मीन के नीचे छिपे कीड़े बाहर आ जाते हैं, वैसा ही इस मामले में भी हो रहा है.
इसीलिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सड़क पर उतर कर विरोध कर रही हैं. वहीं तृणमूल प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि पहले तो अल्पसंख्यकों को निकालने की चर्चा चल रही थी, अब मतुआ और एसएसटी को भी भगाने की बात हो रही है. सीमावर्ती इलाकों में जो भारी वृद्धि हुई है, इसे देखा जाना चाहिए कि ज़्यादातर मामलों में सीमावर्ती इलाकों के सांसद किस राजनीतिक दल के हैं.
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