खास बातें
Suvendu Adhikari Political Strategy: पश्चिम बंगाल की सत्ता के केंद्र में भले ही कोलकाता का ‘नबान्न’ हो, लेकिन राज्य की वर्तमान राजनीतिक दिशा और दशा का निर्धारण अक्सर पूर्व मेदिनीपुर के कांथी (Contai) से होता है. मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की कार्यशैली ने बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है. आमतौर पर मुख्यमंत्री सचिवालय से राज्य चलाते हैं, लेकिन शुभेंदु ने एक नयी लकीर खींची है.
ग्राउंड कनेक्ट है शुभेंदु की सबसे बड़ी ताकत
विश्लेषकों का मानना है कि उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका ग्राउंड कनेक्ट और जिलों की नब्ज पर पकड़ है. आखिर क्या है, जो शुभेंदु अधिकारी को पारंपरिक राजनेताओं से अलग बनाता है? प्रभात खबर की इस विशेष रिपोर्ट में पढ़ें उनकी राजनीति के वो अनछुए पहलू, जो अब तक चर्चा से दूर रहे हैं.
कांथी बना मिनी सचिवालय
शुभेंदु अधिकारी की राजनीति का सबसे मजबूत स्तंभ उनका अपना जिला और घर है. बड़े नेता अक्सर दिल्ली या कोलकाता के वातानुकूलित कमरों में रणनीति बनाते हैं. लेकिन, शुभेंदु का ज्यादातर समय कांथी के ‘शांति कुंज’ और बंगाल के सुदूर गांवों में बीतता है. वे राज्य के हर जिले के ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ताओं को उनके नाम से जानते हैं. यह व्यक्तिगत जुड़ाव उन्हें सूचनाओं का ऐसा नेटवर्क देता है, जो इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) से भी तेज माना जाता है. योजनाओं का क्रियान्वयन हो या पार्टी का विस्तार, शुभेंदु खुद छोटी-छोटी बातों पर नजर रखते हैं.
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सचिवालय नहीं, जनता के दरबार पर भरोसा
शुभेंदु अधिकारी की कार्यशैली का सबसे अलग हिस्सा है, उनका डिसीजन मेकिंग पैटर्न. वे सरकारी फाइलों से ज्यादा जमीन से आने वाले फीडबैक पर भरोसा करते हैं. ‘अन्नपूर्णा भंडार’ जैसी योजनाओं में जो 11 पन्ने का डेटा फॉर्म लाया गया, वह इसी ‘कांथी मॉडल’ की उपज है, ताकि कोई भी अपात्र व्यक्ति सिस्टम का फायदा न उठा सके.
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संकटमोचक की भूमिका और कड़ा अनुशासन
सिंगूर आंदोलन हो या नंदीग्राम, शुभेंदु हमेशा फ्रंटलाइन पर रहे. आज मुख्यमंत्री के रूप में भी वे संकट के समय खुद मौके पर पहुंचना पसंद करते हैं. यह अधिकारियों और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता को बढ़ाता है. उनके प्रशासन में लालफीताशाही के लिए जगह कम है. उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि काम में देरी या भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं किया जायेगा.
Suvendu Adhikari Political Strategy: राजनीतिक रणकौशल
शुभेंदु को ‘बंगाल का चाणक्य’ कहने वाले समर्थकों का मानना है कि वे तृणमूल कांग्रेस (TMC) की रग-रग से वाकिफ हैं. उन्होंने टीएमसी के वोट बैंक को उन्हीं के अंदाज में चुनौती दी. योजनाओं के नाम बदलने से लेकर प्रशासनिक फेरबदल तक, उनका हर कदम टीएमसी के प्रभाव को कम करने की एक सोची-समझी चाल है. बीजेपी को बंगाल के कोने-कोने में एक इलेक्शन मशीन की तरह खड़ा करने में उनकी सांगठनिक क्षमता का बड़ा हाथ है.
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क्या है भविष्य की चुनौती?
कांथी से कोलकाता तक का सफर तय करने के बाद, शुभेंदु के सामने अब पूरे बंगाल के सर्वमान्य नेता बने रहने की चुनौती है. उनकी ‘कट्टर’ छवि कुछ तबकों में डर पैदा करती है, लेकिन उनके समर्थक इसे ‘सुशासन का डंडा’ कहते हैं.
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