नोटबंदी से किसान व खेतिहर मजदूर सर्वाधिक प्रभावित

कोलकाता: नोटबंदी के कदम के बाद होनेवाली समस्याओं को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ किसान और खेतिहर मजदूरों के संगठनों का विरोध भी शुरू हो गया है. पश्चिम बंग प्रादेशिक किसान सभा की ओर से दावा किया गया है कि नोटबंदी के कदम से राज्य में सबसे ज्यादा प्रभावित किसान और खेतिहर मजदूर हैं. […]

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कोलकाता: नोटबंदी के कदम के बाद होनेवाली समस्याओं को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ किसान और खेतिहर मजदूरों के संगठनों का विरोध भी शुरू हो गया है. पश्चिम बंग प्रादेशिक किसान सभा की ओर से दावा किया गया है कि नोटबंदी के कदम से राज्य में सबसे ज्यादा प्रभावित किसान और खेतिहर मजदूर हैं. पश्चिम बंग प्रादेशिक किसान सभा के महासचिव अजीत मुखर्जी का कहना है कि नोटबंदी के कदम के बाद करीब 75 लाख खेतिहर मजदूरों की रोजी-रोजी पर संकट बन गया है. बंगाल की कुल आबादी में करीब 67 प्रतिशत हिस्सा गांव में रहते हैं. इनमें किसानों का एक बड़ा भाग शामिल है.
मौजूदा समय आलू की खेती का है. धान बेच कर किसान आलू की खेती पर जोर देते हैं. प्रति क्विंटल धान एक हजार रुपये से भी कम मूल्य पर बेचने को किसान मजबूर हो रहे हैं, जबकि सरकारी दर पर प्रति क्विंटल धान करीब 1,446 रुपये है. ऐसे में किसानों को घाटा हो रहा है. आलू की खेती के लिए ऋण की समस्या हो रही है. मुनाफा की कमी के कारण खेतिहर मजदूरों को वे काम पर भी नहीं रख सकते. ऐसे मेें किसानों के साथ खेतिहर मजदूरों की स्थिति समय के साथ दयनीय होती जा रही है.
मुखर्जी ने कहा कि किसान व खेतिहर मजदूूर संगठन काला धन रखनेवाले लोगों के खिलाफ कदम उठाने व नोटबंदी का विरोध नहीं कर रहे हैं, लेकिन उपरोक्त कदम कारगर योजना के तहत लागू करनी चाहिए थी. नये नोट की पर्याप्त उपलब्धता जरूरी है. किसानों और खेतिहर मजदूरों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए पश्चिम बंग प्रादेशिक किसान सभा बड़े आंदोलन की तैयारी में है. उनकी ओर से तमाम संगठनों को एकजुट का आह्वान भी किया गया है.
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