कोलकाता : जब भी बात अंग प्रत्यारोपण की होती है तो आंखें स्पेन की ओर उठती हैं. ‘ग्लोबल आब्जर्वेटरी आन डोनेशन एंड ट्रांसप्लांट’ के अनुसार विश्व में अंगदान व ऑर्गन ट्रांसप्लांट के मामले में स्पेन सबसे आगे है, लेकिन पश्चिम बंगाल भी इसमें पीछे नहीं है. हाल के दिनों में बंगाल में मरणोपरांत अंगदान करने […]
ByPrabhat Khabar Digital Desk|
कोलकाता : जब भी बात अंग प्रत्यारोपण की होती है तो आंखें स्पेन की ओर उठती हैं. ‘ग्लोबल आब्जर्वेटरी आन डोनेशन एंड ट्रांसप्लांट’ के अनुसार विश्व में अंगदान व ऑर्गन ट्रांसप्लांट के मामले में स्पेन सबसे आगे है, लेकिन पश्चिम बंगाल भी इसमें पीछे नहीं है. हाल के दिनों में बंगाल में मरणोपरांत अंगदान करने के मामले में तेजी आयी है. 2018 में जुलाई से लेकर दिसंबर तक तकरीबन 14 अंग प्रत्यारोपण हुए थे, जिसमें सबसे अधिक संख्या हृदय प्रत्यारोपण की है.
ध्यान देनेवाली बात यह है कि यहां पहली बार ब्रेन डेथ के घोषित कैडेवर यानी शव से लिये गये हर्ट का भी सफल प्रत्यारोपण किया गया. वहीं इस वर्ष जनवरी महीने में साल का पहला हृदय प्रत्यारोपण मेडिकल कॉलेज में किया गया है. यानी मरणोपरांत अंगदान के मामले में विश्व स्तर पर राज्य के ग्राफ सुधर रहा है. इसी साल 13 जनवरी को मेडिका सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में पहली बार लीवर ट्रांसप्लांट किया गया, जो सफल रहा. अब मरीज को अस्पताल से छुट्टी दी गयी है. मरीज का नाम मुकेश कुमार साह (40) है.
अस्पताल के गैस्ट्रोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ पीके सेठी ने बताया कि मुकेश लीवर सिरोसिस से पीड़ित था. वहीं उसके शरीर में पीलिया का स्तर बढ़ कर 21 हो गया था. स्थिति काफी गंभीर बनी हुई थी. सभी जांच के बाद लीवर प्रत्यारोपण के लिए मुकेश को लीवर प्रत्यारोपण विशेषज्ञ डॉ हीरक पहाड़ी के पास रेफर किया गया. डॉ पहाड़ी के नेतृत्व वाली टीम ने लीवर प्रत्यारोपण को सफलता पूर्वक अंजाम दिया. डॉ पहाड़ी ने बताया कि मरीज फैटी लीवर की समस्या से भी जूझ रहा था.
डॉ ने कहा कि फैटी लीवर के मामले में आमतौर पर 15 से 30 मामलों में मरीज सिरोसिस की चपेट में आ सकता है. डॉक्टर ने बताया कि दो तरीके से लीवर का प्रत्यारोपण किया जाता है. पहला परिवार में से ही किसी के लीवर का प्रत्यारोपण कर दिया जाये या फिर मरीज का नाम कैडेवर लीवर ट्रांसप्लांट रसिपिएंट लिस्ट में दर्ज करवा दिया जाये. डॉक्टरों ने दोनों ही विकल्पों के बारे में विस्तार से समझाया.
उन्होंने कहा कि एक तरफ तो लंबी लिस्ट से जूझना होगा, क्योंकि इसकी कोई गारंटी नहीं होती कि उक्त लिस्ट से नाम जोड़े जाने के बाद कोई भी अंग कितने दिनों के भीतर मिल जाये.
दूसरी तरफ अपने ही परिवार में अगर लीवर दान करवा जाये तो यह मरीज के लिए जीवन रक्षक साबित होता है. इसके साथ ही लीवर दान करनेवाले व्यक्ति को भी किसी तरह की शारीरिक परेशानी नहीं होती है.
डॉ पहाड़ी ने कहा कि लीवर शरीर का एक ऐसा अंग है, जिसका आधा हिस्सा डोनेट (दान) करने के बाद वह बढ़ कर नॉर्मल साइज में आ जाता है. डोनर को भविष्य में कोई तकलीफ नहीं होती, जबकि उसके किए लीवर डोनेशन से एक व्यक्ति को नयी जिंदगी मिल सकती है.
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