राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) से जुड़े मुद्दों को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के आगरा विश्वविद्यालय के सह मंत्री धीरज सिंह ने अपनी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि प्रारंभ में छात्रों की समस्याओं और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की मांग को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन अब अपने मूल उद्देश्य से भटककर राजनीतिक स्वरूप ले चुका है. उनका कहना है कि विभिन्न राजनीतिक दलों की बढ़ती भागीदारी के बाद आंदोलन का चरित्र बदल गया है और इसके कारण कई स्थानों पर तनाव एवं हिंसक घटनाएं भी देखने को मिली हैं.
धीरज सिंह ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्रों को अपनी समस्याओं और अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाने का पूरा अधिकार है. लेकिन जब किसी छात्र आंदोलन में राजनीतिक दलों की सीधी दखल बढ़ने लगती है, तब उसका मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है. उनके अनुसार, छात्र आंदोलनों को हमेशा छात्रों के हितों तक सीमित रहना चाहिए और उन्हें किसी भी राजनीतिक एजेंडे का माध्यम नहीं बनने देना चाहिए.
उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर पर शुरू हुआ आंदोलन छात्रों की वास्तविक चिंताओं को सामने रखने का एक मंच था, लेकिन समय के साथ इसमें विभिन्न राजनीतिक दलों और संगठनों की सक्रिय भागीदारी बढ़ गई. धीरज सिंह का आरोप है कि इसके बाद आंदोलन का स्वरूप बदल गया और कई स्थानों पर टकराव तथा हिंसक घटनाओं की स्थिति उत्पन्न हुई.
एबीवीपी नेता ने कहा कि देश पहले भी कई ऐसे आंदोलन देख चुका है, जहां छात्रों या युवाओं के मुद्दों को लेकर शुरू हुए अभियानों में बाद में राजनीतिक दलों ने हस्तक्षेप किया और उन्हें अपने राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल करने का प्रयास किया. उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल अक्सर ऐसे आंदोलनों को अपने लिए अवसर मानते हैं और जनभावनाओं का लाभ उठाकर अपने राजनीतिक उद्देश्य साधने का प्रयास करते हैं.
धीरज सिंह ने छात्रों से अपील करते हुए कहा कि उन्हें किसी भी राजनीतिक दल से पर्याप्त दूरी बनाए रखनी चाहिए और अपने आंदोलन की दिशा स्वयं तय करनी चाहिए. उनके अनुसार, यदि छात्र अपने मुद्दों को निष्पक्ष और शांतिपूर्ण तरीके से उठाते हैं तो उनकी आवाज अधिक प्रभावी ढंग से सरकार और समाज तक पहुंचती है.
उन्होंने कहा कि शिक्षा, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और छात्रों के भविष्य जैसे विषय अत्यंत संवेदनशील हैं. ऐसे मुद्दों को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनाने के बजाय सभी पक्षों को मिलकर समाधान खोजने का प्रयास करना चाहिए. उनका मानना है कि छात्रों का हित सर्वोपरि होना चाहिए और किसी भी आंदोलन की सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि वह अपने मूल उद्देश्य पर कितना केंद्रित रहता है.
हालांकि, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्र संगठनों और विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से इस विषय पर अलग-अलग मत सामने आए हैं. कई छात्र संगठनों का कहना है कि उनका आंदोलन पूरी तरह छात्रों के अधिकारों और परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग पर केंद्रित है, जबकि विपक्षी दल सरकार की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं. ऐसे में आंदोलन को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस लगातार जारी है.
