खरसावां. भिंडी की खेती किसानों के लिए कम लागत में अधिक आय देने वाली प्रमुख नकदी फसल मानी जाती है. क्योंकि इसकी तुड़ाई प्रत्येक दो से तीन दिन के अंतराल पर होती है और नियमित आय प्राप्त होती है. हालांकि वर्षा और गर्मी के मौसम में तना एवं फल छेदक कीट तथा पीत शिरा मोजेक रोग के कारण फसल को भारी नुकसान पहुंचता है. इसे रोगों से बचाना भी जरूरी होता है. बिरसा कृषि विश्व विद्यालय के उद्यान महाविद्यालय खूंटपानी के सहायक प्राध्यापक सह वैज्ञानिक डॉ अमित कुमार ने बताया कि भिंडी की बेहतर खेती के लिए 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान तथा हल्की दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. हालांकि फसल में तना एवं फल छेदक कीट तथा पीत शिरा मोज़ेक रोग सबसे बड़ी चुनौती हैं. समय पर इनका नियंत्रण नहीं होने पर उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती है.
तना एवं फल छेदक से 35 प्रतिशत तक उपज का नुकसान
डॉ अमित कुमार ने बताया कि तना एवं फल छेदक कीट का प्रकोप सामान्यतः फूल आने की अवस्था से शुरू होता है. इस कीट की सूंडियां पौधे के कोमल तने और फलों में छेद कर भीतर प्रवेश कर जाती हैं तथा अंदर का भाग खा जाती हैं. इसके कारण पौधों का ऊपरी हिस्सा सूखने लगता है और फल टेढ़े-मेढ़े व विकृत हो जाते हैं. ऐसे फल बाजार में अच्छी कीमत नहीं पाते. इस कीट के कारण लगभग 35 प्रतिशत तक उपज प्रभावित हो सकती है.
समेकित कीट प्रबंधन अपनाने की सलाह
विशेषज्ञों ने किसानों को तना एवं फल छेदक के नियंत्रण के लिए समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) अपनाने की सलाह दी है. गर्मी के मौसम में खेत की गहरी जुताई करने से मिट्टी में छिपे कीट नष्ट हो जाते हैं. प्रभावित तनों और फलों को समय रहते काटकर नष्ट कर देना चाहिए, ताकि संक्रमण आगे न फैले. जैविक नियंत्रण के लिए बैसिलस थूरिंजिएन्सिस का छिड़काव लाभकारी है. यदि प्रकोप अधिक हो तो इमामेक्टिन बेंजोएट या साइपरमेथ्रिन का अनुशंसित मात्रा में छिड़काव किया जा सकता है. किसानों को कीटनाशकों का उपयोग कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए.
पीत शिरा मोजेक रोग सबसे घातक बीमारी
भिंडी की सबसे गंभीर बीमारी पीत शिरा मोजेक रोग है, जो विषाणु जनित रोग है और मुख्य रूप से सफेद मक्खी के माध्यम से फैलता है. इस रोग में पत्तियों की शिराएं और फल पीले पड़ जाते हैं, पौधों की वृद्धि रुक जाती है तथा फूल और फल बनना कम हो जाता है. वर्षा ऋतु में इसका प्रकोप अधिक देखा जाता है. रोग के कारण 80 से 85 प्रतिशत तक उत्पादन प्रभावित हो सकता है.
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सफेद मक्खी पर नियंत्रण से रुकेगा रोग का प्रसार
विशेषज्ञों ने बताया कि पीत शिरा मोजेक रोग से बचाव के लिए सफेद मक्खी का नियंत्रण सबसे आवश्यक है. इसके लिए खेत की मेड़ों पर पहले से मक्का या ज्वार की बुआई करने की सलाह दी गई है, जिससे सफेद मक्खी का प्रवेश कम होता है. रोगग्रस्त पौधों को शुरुआती अवस्था में ही उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए. खेत को खरपतवार मुक्त रखना तथा संतुलित उर्वरकों का प्रयोग भी आवश्यक है. आवश्यकता पड़ने पर मेटासिस्टॉक्स का अनुशंसित मात्रा में छिड़काव कर सफेद मक्खी पर नियंत्रण पाया जा सकता है.
विशेषज्ञ की अपील
डॉ अमित कुमार ने किसानों से अपील की कि भिंडी की फसल में नियमित निगरानी रखें और कीट या रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही वैज्ञानिक सलाह के अनुसार प्रबंधन करें. समय पर समेकित उपाय अपनाने से उत्पादन बढ़ेगा, लागत घटेगी और किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ मिलेगा.
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