World Tribal Day: जब-जब प्रकृति और जनजातीय भाषा पर संकट आया, झारखंड के ये 5 पद्मश्री हीरो बने ढाल

विश्व आदिवासी दिवस सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि झारखंड के नायकों के अस्तित्व और अस्मिता का प्रतीक है. जानिए कैसे भगवान बिरसा मुंडा और जतरा टाना भगत जैसे नायकों ने जल, जंगल, भाषा और जमीन को बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित किया.

रांची : 9 अगस्त यानी विश्व आदिवासी दिवस- जल, जंगल भाषा और जमीन के संरक्षण का संदेश देने वाला सबसे बड़ा दिन. यह दिन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आदिवासी समुदाय के अस्तित्व और अस्मिता से जुड़ा है. इतिहास गवाह है कि जब-जब इन प्राकृतिक संसाधनों पर संकट आया, झारखंड की माटी के नायकों ने अपनी जान की बाजी लगा दी. भगवान बिरसा मुंडा और जतरा टाना भगत का संघर्ष तो आजादी से पहले की दास्तान है, लेकिन आजादी के बाद भी यह लड़ाई थमी नहीं. आधुनिक दौर में भी झारखंड के कई ऐसे नायक खड़े हुए, जिन्होंने अपनी जिद और समर्पण से जल, जंगल और जमीन को बचाया. इनके इसी अतुलनीय योगदान के लिए इन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्मश्री' (Padma Shri) से सम्मानित किया गया. विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर जानिए झारखंड के ऐसे ही 5 आदिवासी 'पद्मश्री' नायकों की प्रेरणादायक कहानी."

डॉ. रामदयाल मुंडा

रांची विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति, प्रसिद्ध मानवशास्त्री और बांसुरी वादक डॉ. रामदयाल मुंडा ने झारखंडी संस्कृति और 'मुंडारी' भाषा को वैश्विक मंच प्रदान किया. संयुक्त राष्ट्र (UN) के सम्मेलनों से लेकर अमेरिका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी तक उन्होंने आदिवासी दर्शन का परचम लहराया. इसी वजह से उन्हें साल 2010 में पद्मश्री पुरष्कार मिला हुआ है.

सिमोन उरांव

रांची के बेड़ों इलाके के रहने वाले सिमोन उरांव को दुनिया 'झारखंड के वाटरमैन' के नाम से जानती है. बिना किसी सरकारी मदद के अपने दम पर दर्जनों चेक डैम और तालाब बनवाकर सूखे खेतों को लहलहाने वाले सिमोन दादा ने पर्यावरण संरक्षण का एक शानदार मॉडल पेश किया. पर्यावरण और जल संरक्षण के लिए उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से नवाजा.

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दिगंबर हांसदा

संताली भाषा और साहित्य को नई पहचान दिलाने में प्रोफेसर दिगंबर हांसदा का बड़ा योगदान रहा है. उन्होंने संताली भाषा को देवनागरी और ओलचिकी लिपि में समृद्ध करने और जनजातीय समाज में शिक्षा के प्रसार के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया. इसी वजह से उन्हें साहित्य और शिक्षा के लिए साल 2018 में पद्मश्री पुरष्कार मिला.

जमुना टुडू

झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिला की रहने वाली की जमुना टुडू ने जंगलों को लकड़ी माफियाओं से बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी. दुनिया उन्हें लेडी टार्जन के नाम से जानती है. उन्होंने 'वन सुरक्षा समिति' बनाकर हजारों आदिवासी महिलाओं की सेना खड़ी की, जो आज भी जंगलों की ढाल बनी हुई हैं. जंगल को बचाने की वजह से उन्हें वर्ष 2019 में पद्मश्री पुरष्कार से नवाजा गया है.

डॉ. जानम सिंह सोय

झारखंड के हो जनजाति से ताल्लुक रखने वाले डॉ. जानम सिंह सोय को साल 2023 में साहित्य और भाषा संरक्षण के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया था. वे कोल्हान क्षेत्र के रहने वाले हैं. उन्होंने विलुप्त होने की कगार पर खड़ी 'हो' (Ho) भाषा की संरक्षण के लिए 4 दशक तक संघर्ष किया. कई किताबें लिखकर उन्होंने 'हो' साहित्य को राष्ट्रीय पहचान दिलाई थी.

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लेखक के बारे में

By समीर उरांव

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.

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