झारखंड आंदोलन के दिनों में साधु बने थे शिबू सोरेन, सत्ता में आए तो इन लोगों को दी थी प्राथमिकता
Shibu Soren Birth Anniversary: दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने अलग झारखंड आंदोलन के लिए जीवनभर संघर्ष किया. धनकटनी आंदोलन से लेकर साधु का वेश धारण कर गिरफ्तारी से बचने तक, उन्होंने आदिवासी और गरीबों के अधिकार के लिए हर मोर्चे पर लड़ाई लड़ी. मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उनका फोकस सामाजिक न्याय और गरीबी उन्मूलन पर रहा.
Shibu Soren Birth Anniversary: 4 अगस्त को झारखंड ने ऐसा सितारा राज्य ने खो दिया, जिसने अलग झारखंड के सिर्फ लड़ाई नहीं लड़ी बल्कि समाजिक न्याय और बल्कि उनके हक हर संभव आंदोलन किया. खासकर आदिवासी समाज को जागरूक करने के लिए उन्होंने जो कदम उठाया वह किसी से छिपा हुआ नहीं है. रात्रि पाठशाला इसी का सबसे उदाहरण है. राज्य के आंदोलन में सक्रिय रूप से हिस्सा लेने वाले जमशेदपुर के पूर्व सांसद उन्हें झारखंड का नेल्सन मंडेला कहते हैं. आज उनका जन्मदिन है. ऐसा पहली बार होगा जब वह अपने जन्मदिन पर खुद ही नहीं होंगे.
आंदोलन कमजोर न पड़े इसके लिए वेश भी बदले
1960-70 के दशक में शिबू सोरेन की धनकटनी आंदोलन का किस्सा लगभग हर कोई जानता है. जब आदिवासियों ने उनके नेतृत्व में महाजन/साहूकारों की फसल बिना अनुमति के काट लिया था. यह आंदोलन महजनों के शोषण के खिलाफ एक सामाजिक प्रतिरोध था और लोगों को अपने जमीन-अधिकार के लिए पहला संगठित प्रयास था. लेकिन क्या आपको पता है कि झारखंड आंदोलन के दौरान जब उनके ऊपर कई केस दर्ज चुके थे तब उनकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस लगातार छापा मार रही थी. लेकिन आंदोलन कमजोर न पड़े इसके लिए वह कई कई दिनों तक वेश बदलकर जंगल में छिपते थे. कभी वह किसान का रूप धारण कर लेते तो कभी साधु और कभी महिला का रूप धरकर वे छिपते रहते थे.
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गरीबों पर अत्याचार होता था तो खुलकर विरोध करते थे
जब शिबू सोरेन का हुआ तो प्रभात खबर ने उनकी बहन शकुंतला देवी से बात की थी. उस वक्त उनकी बहन ने शिबू सोरेन को याद करके कही थी कि भैया ने हमेशा जुल्म के खिलाफ आवाज उठायी. चाहे कोई कितना भी ताकतवर क्यों न हो, अगर गरीबों पर अत्याचार करता था, तो वह खुलकर उसका विरोध करते थे.
मुख्यमंत्री बने तो गरीबी मिटाने पर था फोकस
शिबू सोरेन ने मुख्यमंत्री बनने के जब पहली कैबिनेट की बैठक थी तो उनका फोकस गरीबी मिटाने पर थी. उन्होंने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा था कि वे गरीबों पर विशेष ध्यान देना चाहते हैं. इसलिए उन्होंने लाल कार्ड, जनवितरण प्रणाली, सड़क, मनरेगा व पलायन जैसी बुनियादी बातों को दुरुस्त करने की अपनी योजना बतायी थी. उन्होंने उस वक्त मुख्य सचिव को अपने पहले निर्देश में ही सड़क पर हड़िया-दारू बेचनेवालों को वैकल्पिक रोजगार मुहैया कराने का निर्देश दिया था. उन्होंने कहा कि था कि आदिवासी कहते हैं कि हड़िया-दारू पीना हमारी संस्कृति है. पर दारू पीकर सड़क पर लुढ़क जाना और गाड़ी के नीचे दब जाना कहां की संस्कृति है?
जब झारखंड को वनांचल कहने पर भड़क उठे थे शिबू सोरेन
बात 28 मई 1996 की है. जब दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने झारखंड का नाम वनांचल रखने पर भड़क उठे थे. शिबू सोरेन का कहना था कि “प्रधानमंत्री बराबर सांस्कृतिक धरोहर की बात करते हैं और इसी आधार पर बंबई जो अंग्रेजी नाम था, उसे मुंबई किया. झारखंड जो हमारा पौराणिक नाम है, जिसमें हमारी श्रद्धा और संस्कृति रही है, जंगल-झाड़ का, उसको ये लोग वनांचल बोलते हैं. उत्तराखंड जिसे हमलोग बोलते थे, उसे उत्तरांचल बोल दिया. इसके क्या मायने हैं. अगर आदमी का परिचय, आदमी का इतिहास समाप्त हो जाएगा, तो क्या मिलेगा. हमें कौन सा राज्य चाहिए, कौन सा अलग राज्य चाहिए. आदिवासियों की अलग परंपरा है, आदिवासी जंगलों में रहते हैं. उनकी अपनी-अपनी जाति और नाम है. उनका अपना सरनेम होता है. जो टोप्पो, कश्यप और उरांव हैं, उनको ये लोग बोलते हैं अपने नाम के अंत में राम लिखो. तो इसका क्या असर होगा, क्या अंजाम होगा. तो क्या डर के मारे हमलोग अपने नाम के अंत में राम लिखे. दुखी समाज को भी दुख देने का अगर नियम बने तो क्या हो सकता है.”
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