अनोखी परंपरा : आस्था के कारण नहीं जला चूल्हा, जीवित रही बंगाली समाज की सदियों पुरानी परंपरा

अनोखी परंपरा : आस्था के कारण नहीं जला चूल्हा, जीवित रही बंगाली समाज की सदियों पुरानी परंपरा

: शीतला षष्ठी पर बंगाली समाज के घरों में नहीं जला चूल्हा : बासी भोजन से हुई मां शीतला की पूजा सुरेंद्र कुमार/शंकर पोद्दार रजरप्पा. सरस्वती पूजा के दूसरे दिन शीतला षष्ठी के अवसर पर रजरप्पा समेत आस-पास के इलाकों में बंगाली समाज के घरों में रसोई की आग नहीं जली. आम दिनों की तरह सुबह से चूल्हा जलने के बदले घरों में शांति और श्रद्धा का माहौल देखने को मिला. परंपरा के अनुसार, परिवार के सभी सदस्यों ने मां शीतला की आराधना कर बासी भोजन ग्रहण किया. बसंत पंचमी के दूसरे दिन मनाये जाने वाले इस पर्व को बंगाली समुदाय सदियों से नियम और श्रद्धा के साथ मनाता आ रहा है. मान्यता है कि मां शीतला या मां षष्ठी संतान की रक्षा करने वाली देवी हैं. इसी विश्वास के साथ महिलाएं इस दिन विशेष रूप से पूजा करती हैं. अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं. शीतला षष्ठी की तैयारी एक दिन पहले ही शुरू हो जाती है. सरस्वती पूजा के दिन सात या नौ प्रकार की सब्जियां, चावल और पारंपरिक व्यंजन तैयार किये जाते हैं. अगले दिन इन्हीं ठंडे व्यंजनों से मां शीतला की पूजा की जाती है. इस दिन गर्म भोजन बनाना वर्जित माना जाता है. इस पर्व की एक विशेष परंपरा यह भी है कि घरों में सिल-लोढ़ा यानी सिलबट्टे का प्रयोग नहीं किया जाता है. सुबह-सुबह महिलाएं विधि-विधान से चूल्हा और सिल-लोढ़ा की पूजा करती हैं. इसके बाद सीजानो नामक विशेष प्रसाद तैयार किया जाता है. इसमें कई घरों में नौ प्रकार की सब्जियों और दाल का मिश्रण शामिल होता है. पूजा के बाद परिवार के सभी सदस्य प्रसाद स्वरूप उसी भोजन को ग्रहण करते हैं. सीजानो केवल घर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसे पड़ोसियों और रिश्तेदारों को भी खिलाया जाता है. इससे सामाजिक सौहार्द्र और आपसी भाईचारे की भावना और मजबूत होती है. पीढ़ियों से चली आ रही है परंपरा, जीवंत है सांस्कृतिक पहचान : बुजुर्गों का कहना है कि शीतला षष्ठी केवल पूजा-पाठ का पर्व नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जीवनशैली और सोच का प्रतीक है. उनका मानना है कि इस दिन चूल्हा नहीं जलाने और बासी भोजन करने की परंपरा हमें संयम, सादगी और प्रकृति के साथ संतुलन का संदेश देती है. पहले के समय में यह परंपरा स्वास्थ्य से भी जुड़ी मानी जाती थी, जब बदलते मौसम में ठंडा भोजन शरीर के लिए लाभकारी समझा जाता था. बुजुर्गों के अनुसार, शीतला षष्ठी के दिन मां शीतला की पूजा कर संतान की रक्षा, रोगों से बचाव और परिवार की सुख-शांति की कामना की जाती है. उनका कहना है कि आधुनिक जीवनशैली और बदलते दौर के बावजूद अगर समाज अपनी परंपराओं को नहीं भूले, तो सांस्कृतिक पहचान हमेशा जीवित रहती है. यही कारण है कि आज भी बंगाली समाज पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ इस पर्व को मना कर आने वाली पीढ़ी को अपनी परंपरा से जोड़ने का प्रयास कर रहा है.

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Published by: Saroj tiwary

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