मोहम्मदगंज : आधुनिकता के दौर में भी पलामू के मोहम्मदगंज प्रखंड के भजनिया में मछुआरा समुदाय अपनी 100 वर्षों से अधिक पुरानी परंपरा को संजोए हुए है. सावन पूर्णिमा से एक दिन पूर्व बुधवार को भजनिया के मछुआरों ने कोयल-काशी स्रोत नदी के संगम स्थल पर नाव और नदियों की विधिवत पूजा की. इस दौरान नदी तट पर महिलाओं और पुरुषों ने पूजा-अनुष्ठान, हवन और प्रार्थना गीतों में हिस्सा लिया. पूजा से पहले नदी तट स्थित घाट की साफ-सफाई की गयी. इसके बाद फूल-मालाओं से पूजा स्थल को सजाया गया और नाव के साथ नदी की पूजा की रस्म पूरी की गयी. भजनिया के चौधरी परिवार के भगत नरेश कुमार चौधरी ने विधिवत पूजा-अनुष्ठान कराया.
पूर्वजों ने शुरू की थी परंपरा, आज भी निभा रहे वंशज
भगत नरेश कुमार चौधरी ने बताया कि नाव और नदियों की पूजा की यह परंपरा सौ वर्षों से अधिक पुरानी है. उनके पूर्वजों ने इसकी शुरुआत की थी. इसे गंगा मैया की पूजा के रूप में किया जाता है. मछुआरा समुदाय का मानना है कि नदी के गहरे पानी और बाढ़ के दौरान काम करने के बावजूद अब तक कोई बड़ी अनहोनी नहीं हुई है. उन्होंने बताया कि रात के समय भी नदी में मछली पकड़ने जाते वक्त गंगा मैया का नाम लेकर आस्था प्रकट की जाती है. मान्यता है कि इस पूजा से नदी के गहरे पानी और बाढ़ में डूब रहे लोगों को बचाने की शक्ति मिलती है.
गोताखोर मल्लाहों के लिए नदी सिर्फ रोजी नहीं, जिम्मेदारी भी
भजनिया के गोताखोर मल्लाहों की पहचान पलामू और गढ़वा जिले के ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से रही है. यहां के मल्लाहों द्वारा नदी में डूब रहे लोगों को बचाने के कई कारनामे क्षेत्र में चर्चित रहे हैं. वर्तमान में मुन्ना चौधरी इनके कार्यों का नेतृत्व करते हैं. पूजा-अनुष्ठान पूरा होने के बाद सूकर की बलि दी गयी. वहीं नदी तट पर महिलाओं के समूह ने गंगा मैया की आस्था में प्रार्थना गीत गाये.
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गुमानी चौधरी के बाद कन्हाई और नरेश संभाल रहे परंपरा
बताया गया कि कई वर्षों तक भजनिया के गुमानी चौधरी इस प्राचीन परंपरा को आगे बढ़ाते रहे. उनके निधन के बाद कन्हाई चौधरी और नरेश चौधरी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं.
20 परिवारों की आजीविका नदियों पर निर्भर
भजनिया में चौधरी परिवार के करीब 20 घरों की आजीविका सीधे तौर पर नदियों से जुड़ी है. परिवार के लोग कोयल नदी पर बने भीम बराज के ऊपरी और निचले हिस्से में मछली पकड़कर उसे स्थानीय बाजारों में बेचते हैं. कोयल और सोन नदी इनके लिए सिर्फ जलस्रोत नहीं, बल्कि रोजी-रोटी का स्थायी साधन हैं. यही वजह है कि मछुआरा परिवार वर्षों से नाव और नदियों की पूजा को अपनी आस्था और परंपरा का हिस्सा बनाए हुए हैं.मौके पर सुनील कुमार, गुड्डू कुमार, अनिल कुमार, विजेंदर चौधरी, संतोष चौधरी, पूजा देवी, निर्मला देवी समेत अन्य लोग मौजूद थे.
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