संतोष कुमार की रिपोर्ट बेतला नेशनल पार्क. आज सावन मास की अंतिम सोमवारी है. इस पावन अवसर पर शिवालयों में सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है. आस्था, अध्यात्म और प्राकृतिक सौंदर्य का एक अनूठा संगम देखना हो, तो पलामू टाइगर रिजर्व के कोने-कोने में मौजूद असंख्य पर्यटन स्थलों में बरवाडीह स्थित पहाड़ी शिव मंदिर की अपनी अलग पहचान है. वर्षों पुराना यह मंदिर न केवल लाखों लोगों की आस्था और अध्यात्म के साथ जुड़ा है, बल्कि पर्यटन के लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण है. लाखों श्रद्धालुओं का ऐसा अटूट विश्वास है कि पहाड़ी मंदिर आने वाले सभी भक्तों की मनोकामनायें पूर्ण होती हैं. यही कारण है कि यह मंदिर एक शांत और पवित्र धार्मिक स्थल के रूप में दूर-दूर तक चर्चित है.
पहाड़ी से गिरती थी जलधारा
इस ऐतिहासिक मंदिर के बारे में एक अत्यंत रोचक कथा प्रचलित है. बताया जाता है कि प्राचीन काल में इस पहाड़ी से एक प्राकृतिक जल की धारा बहती थी. इस निर्मल जलधारा को कुछ स्थानीय लोगों के द्वारा दूध की धारा भी माना जाता था. इस अद्भुत चमत्कार को देखकर लोगों ने यहां पर साक्षात भगवान शिव का वास स्थान समझा.
छोटे से शिव मंदिर का निर्माण
इसके बाद भक्तों ने मिलकर यहां पर छोटे से शिव मंदिर का निर्माण कार्य कराया. धीरे-धीरे भक्तों के सहयोग से इस मंदिर को एक भव्य रूप दिया गया. शिव मंदिर की स्थापना के बाद यहां बजरंग बली को समर्पित हनुमान मंदिर का निर्माण कराया गया. इसके साथ ही पहाड़ी पर सुगम आवागमन के लिए पक्की सीढ़ियों का भी निर्माण कराया गया.
अद्भुत है मंदिर की बनावट और भौगोलिक स्थिति
इस मनोरम पहाड़ी की बनावट बेहद अनूठी है. पहाड़ी के निचले हिस्से में भगवान शिव को समर्पित शिव मंदिर स्थापित है, जहां आज अंतिम सोमवारी पर जलाभिषेक के लिए भक्तों की लंबी कतारें लगी हैं. इसके बीचों-बीच, पहाड़ी के हृदय स्थल पर रामभक्त हनुमान को समर्पित हनुमान मंदिर है.
पलामू टाइगर रिजर्व के घने बीहड़ जंगल
भौगोलिक दृष्टिकोण से देखें तो इस पहाड़ी के एक ओर जहाँ बरवाडीह रेलवे जंक्शन है, वहीं दूसरी ओर पलामू टाइगर रिजर्व के घने बीहड़ जंगल फैले हैं. करीब एक किलोमीटर दूर तक फैले इस पहाड़ी की चोटी पर साक्षात देवी को समर्पित एक भव्य देवी मंदिर भी है.
प्राकृतिक सौंदर्य और रोमांच का सफर
पहाड़ी मंदिर का प्राकृतिक सौंदर्य, शांत वातावरण और भक्ति का माहौल इसे धार्मिक महत्व और पर्यटन दोनों दृष्टि से आकर्षक बनाता है. यह पहाड़ी बरवाडीह की मुख्य पहचान है. यहा़ पहुंचने पर श्रद्धालु सैलानियों का स्वागत सबसे पहले भगवान शिव के दर्शन से होता है.
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460 पक्की सीढ़ियों को चढ़ने के बाद हनुमान मंदिर
इसके बाद करीब 460 पक्की सीढ़ियों को चढ़ने के बाद हनुमान मंदिर में बजरंग बली के दर्शन होते हैं. इतनी लंबी दूरी तय करने के बाद जब लोग बजरंगबली का दर्शन करते हैं, तो अपनी सारी थकान भूल जाते हैं. सैलानियों का रोमांच यहाँ आकर दोगुना हो जाता है. ऊपर चढ़ने के लिए बनाई गयी पक्की सीढ़ियों के बीच-बीच में ठहराव (विश्राम स्थल) बनाये गये हैं.
दिखता है पलामू टाइगर रिजर्व का बेजोड़ नजारा
पहाड़ी की चोटी पर पहुंचने के बाद आसपास के अद्भुत नजारों को देखकर लोग पुलकित हो जाते हैं. यहां पर जब दक्षिण की ओर देखा जाता है, तो वहां का नजारा देखकर लोगों की आंखें टिकी की टिकी रह जाती हैं. दक्षिण दिशा में दिखाई देने वाला यह दृश्य अत्यंत अनुपम और बेजोड़ होता है. यहां से पलामू टाइगर रिजर्व के छिपादोहर पश्चिमी क्षेत्र के घने जंगलों को आसानी से देखा जा सकता है. इसके साथ ही दूर-दूर तक फैली कई पहाड़ियों की खूबसूरत श्रृंखला को यहां से देखना सैलानियों को काफी भाता है. यहाँ आने के बाद लोग प्रकृति की गोद में अपनी सारी थकान भूल जाते हैं.
कैमरे में कैद होते हैं मनमोहक नजारे
सीढ़ियों के विश्राम स्थलों से बरवाडीह का पूरा नजारा और उसकी भौगोलिक संरचना को स्पष्ट देखा जा सकता है. खासकर पहाड़ी के नीचे से होकर रेलवे ट्रैक पर दौड़ती ट्रेनों को देखना पर्यटकों को काफी भाता है. सीढ़ियों के दोनों किनारों पर मौजूद घने जंगल यात्रियों को मानसिक शांति देते हैं. पहाड़ी की चोटी से आसपास के घने जंगलों, बरवाडीह स्टेशन और पूरे शहर का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है, जिसे पर्यटक अपने कैमरों में कैद करना नहीं भूलते. आज अंतिम सोमवारी के पावन दिन यहां का पूरा वातावरण ''हर-हर महादेव'' और ''जय बजरंगबली'' के जयकारों से गूंज रहा है.
कैसे पहुंचें पहाड़ी मंदिर?
बरवाडीह पहाड़ी मंदिर पहुंचना बेहद आसान है क्योंकि यह बरवाडीह रेलवे स्टेशन से बिल्कुल सटा हुआ है. यहां तक पहुंचने के लिए रेलवे और सड़क मार्ग दोनों ही बेहतरीन विकल्प मौजूद हैं. दूरी के लिहाज से देखें तो यह प्रसिद्ध बेतला नेशनल पार्क से करीब 13 किलोमीटर दूर स्थित है. जबकि लातेहार जिला मुख्यालय से इसकी दूरी लगभग 70 किलोमीटर और प्रमंडलीय मुख्यालय मेदिनीनगर (डालटनगंज) से इसकी दूरी महज 30 किलोमीटर है. सुगम यातायात व्यवस्था होने के कारण यहां सालों भर श्रद्धालुओं और सैलानियों का तांता लगा रहता है.
