डोमचांच: देश स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मनाने की तैयारी कर रहा है. आजादी की यह कहानी अनगिनत बलिदानों और संघर्षों से जुड़ी है. स्वतंत्रता आंदोलन में कोडरमा जिले का डोमचांच प्रखंड भी अग्रणी रहा है. वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में डोमचांच के चार वीर सपूतों ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर किये थे. उनके बलिदान की याद में डोमचांच के शहीद चौक पर बना शहीद स्मारक आज भी इतिहास का गवाह है.
आठ अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के आह्वान के बाद कालीमंडा में अवध बिहारी दीक्षित के नेतृत्व में बड़ी संख्या में लोग जुटे. यहां अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन की रणनीति बनायी गयी. इसके बाद आंदोलनकारियों ने डोमचांच डाकघर पर धावा बोलकर उसे क्षतिग्रस्त किया और आग लगा दी. फिर डोमचांच की कलाली को भी आग के हवाले कर दिया. अगले दिन नौ अगस्त को आंदोलनकारी कोडरमा की ओर बढ़े.
इसी दौरान तत्कालीन हजारीबाग एसपीजी रसल ने शहीद चौक पर लाठीचार्ज और गोलीबारी कर आंदोलन दबाने का प्रयास किया. पुलिस की गोली से नुनमन धोबी और चुरामन मोदी शहीद हो गये, जबकि मंगर साव और उदित नारायण मेहता घायल हुए.
स्वतंत्र भारत में विधायक बने दो सेनानी
आजादी के बाद आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अवध बिहारी दीक्षित और विश्वनाथ मोदी विधायक बने. उस दौर के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में अकल सिंह, लिली चक्रवर्ती, रामलखन पांडेय, सुशील कुमार दास, चिरंजीलाल कसेरा, अवधेश चमार, नवल किशोर महथा, टहल राम, राघो दुसाध, विश्वनाथ पांडेय और दु:खन सिंह सहित कई लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.
