जमशेदपुर: किसी भाषा को आगे बढ़ाने के लिए बड़े शहर और बड़े संसाधन ही जरूरी नहीं होते. ओडिशा के मयूरभंज जिले के फागु बास्के ने इसे अपनी मेहनत से साबित किया है. पेशे से शिक्षक और दिल से साहित्यकार फागु बास्के संताली भाषा और साहित्य को आगे बढ़ाने के साथ उसे डिजिटल दुनिया से जोड़ने का काम कर रहे हैं. संताली विकिपीडिया के संस्थापक सदस्यों में शामिल फागु बास्के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन चुके हैं.
वर्ष 1992 में जन्मे फागु बास्के मयूरभंज के बांगरीपोसी क्षेत्र स्थित कुंभीर मुंडी प्राइमरी स्कूल में असिस्टेंट टीचर हैं. वह स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के साथ संताली भाषा और साहित्य के लिए लगातार काम कर रहे हैं. अपनी मातृभाषा और संस्कृति से उनका गहरा जुड़ाव उनकी पहचान बन चुका है.
संताली को इंटरनेट की दुनिया से जोड़ने में निभायी अहम भूमिका
फागु बास्के का काम सिर्फ कविता लिखने तक सीमित नहीं है. उन्होंने संताली भाषा को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आगे बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभायी है. वह संताली भाषा के डिजिटलाइजेशन अभियानों में सक्रिय रहे हैं और संताली विकिपीडिया के संस्थापक सदस्यों में शामिल हैं.
इसके अलावा वह संताली भाषा की प्रमुख ई-पत्रिका ‘बीरमाली’ के सह-संस्थापक और संपादक भी हैं. इंटरनेट और आधुनिक तकनीक के जरिए संताली भाषा को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की उनकी कोशिश लगातार जारी है.
उनकी कहानी बताती है कि अपनी मातृभाषा और संस्कृति से जुड़कर भी आधुनिक तकनीक के साथ आगे बढ़ा जा सकता है. एक तरफ वह प्राथमिक स्कूल के बच्चों को पढ़ाते हैं, दूसरी तरफ संताली में कविताएं लिखते हैं और डिजिटल माध्यमों के जरिए अपनी भाषा को नई पहचान दिलाने में जुटे हैं.
2025 में मिला साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार
फागु बास्के के साहित्यिक सफर में वर्ष 2025 बेहद खास रहा. साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने उनके संताली कविता-संग्रह ‘अड़ा साओं इञ’ को साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार 2025 के लिए चुना.
ग्रामीण स्कूल में शिक्षक के रूप में काम करते हुए अपनी मातृभाषा में लिखे कविता-संग्रह के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलना फागु बास्के की बड़ी उपलब्धि है. यह संताली साहित्य की नई पीढ़ी और ओलचिकी लिपि में लिखने वाले रचनाकारों के लिए भी महत्वपूर्ण उपलब्धि है.
फागु बास्के की यात्रा गांव के एक स्कूल से शुरू होकर राष्ट्रीय साहित्यिक मंच तक पहुंची है. उनका काम उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो अपनी भाषा और संस्कृति के लिए कुछ नया करना चाहते हैं. वह यह संदेश देते हैं कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी नई तकनीक के साथ आगे बढ़ा जा सकता है.
