जमशेदपुर : शहर में जब भी सुवर्णरेखा और खरकई नदियां उफान पर आती हैं, तो लौहनगरी जमशेदपुर को अपने इतिहास की सबसे प्रलयंकारी बाढ़ों की याद ताजा हो जाती है. सुवर्णरेखा परियोजना (एसएमपी ) बाढ़ कोषांग के आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि शहर ने वर्ष 1973 और 2008 में बाढ़ की अब तक की सबसे भयानक विभीषिका झेली थी.
उस दौरान दोनों नदियों का जलस्तर खतरे के निशान को कई मीटर पीछे छोड़ते हुए ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गया था. जिससे शहर का एक बड़ा हिस्सा जलमग्न हो गया था.
खरकई नदी : 1973 में खतरे के निशान से 10 मीटर ऊपर चला गया था पानी
आदित्यपुर ब्रिज स्थित केंद्रीय जल आयोग गेज स्टेशन के ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1973 में खरकई नदी ने 139.85 मीटर का जलस्तर दर्ज किया था. नदी का सामान्य खतरे का निशान 129.00 मीटर तय है. यानी उस दौरान नदी खतरे के स्तर से करीब 10.85 मीटर ऊपर बह रही थी. जो जमशेदपुर के इतिहास का अब तक का सबसे उच्चतम स्तर है.
18 जून 2008 की महाबाढ़ की यादें आज भी करती है भयभीत
18 जून 2008 को खरकई नदी का जलस्तर 137.80 मीटर तक पहुंच गया था. इस बाढ़ ने आदित्यपुर, बागबेड़ा, जुगसलाई और कदमा के बड़े हिस्से को जलमग्न कर दिया था. भारी तबाही मचायी थी.
सुवर्णरेखा नदी : 1973 में 129.82 मीटर के शिखर पर पहुंचा था जलस्तर
मानगो ब्रिज स्थित मापन केंद्र के रिकॉर्ड के अनुसार 1973 की भीषण बाढ़ के दौरान सुवर्णरेखा नदी का जलस्तर 129.82 मीटर दर्ज किया गया था. सुवर्णरेखा के लिए खतरे का निशान 121.50 मीटर निर्धारित है. 2008 की 18 जून को सुवर्णरेखा नदी का जलस्तर 126.15 मीटर तक पहुंच गया था, जो खतरे के स्तर से 4.65 मीटर अधिक था. उस समय मानगो, भुइयांडीह और शास्त्रीनगर के रिहायशी इलाकों में पानी घुस गया था.
आज भी मानक संदर्भ के रूप में उपयोग होते हैं ये आंकड़े
बाढ़ नियंत्रण विभाग और जिला प्रशासन के अनुसार हर साल मानसून के दौरान राहत, बचाव और जलस्तर की निगरानी की रणनीति तैयार करने के लिए 1973 और 2008 के इन उच्चतम स्तरों को मानक बेंचमार्क के रूप में देखा जाता है. ताकि किसी भी संभावित आपदा से समय रहते निपटा जा सके.
