जमशेदपुर : कभी स्कूल जाने के लिए रोजाना 10 किलोमीटर साइकिल चलानी पड़ी, कई बार भूखे-प्यासे रहकर पढ़ाई करनी पड़ी और बचपन में ही पिता का साया सिर से उठ गया. लेकिन इन मुश्किलों ने 24 वर्षीय सालु मुर्मू को तोड़ा नहीं, बल्कि उनके हौसले को और मजबूत किया. आज यही सालु मुर्मू अपनी सफलता को सिर्फ अपने तक सीमित रखने के बजाय 200 से अधिक आदिवासी बच्चों के भविष्य और उनकी सांस्कृतिक पहचान को संवारने में जुटे हैं.
आर्थिक तंगी व चुनौतियों के बीच भी जारी रखी पढ़ाई
पूर्वी सिंहभूम के पोटका के छोटे से गांव चंदनपुर के रहने वाले सालु ने आर्थिक तंगी और तमाम चुनौतियों के बीच पढ़ाई जारी रखी. संताली विषय में अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने कोल्हान विश्वविद्यालय की एमए परीक्षा में दूसरा स्थान हासिल किया. लेकिन उनकी असली उपलब्धि अब यह है कि वे जमशेदपुर के खासमहल स्थित बाहागढ़ में ट्राइबल कल्चर सोसाइटी के माध्यम से बच्चों को नि:शुल्क ओलचिकी लिपि, संताली भाषा, आदिवासी रीति-रिवाज और सांस्कृतिक मूल्यों की शिक्षा दे रहे हैं.
मुश्किलों से लड़कर निकले, अब राह रोशन कर रहे सालु
सालु मुर्मू की कहानी सिर्फ एक छात्र की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस जिद और जुनून की कहानी है, जो अभावों को अपनी कमजोरी नहीं बनने देता. बचपन में ही पिता स्वर्गीय नुना मुर्मू का निधन हो गया. परिवार की जिम्मेदारी मां जावना मुर्मू के कंधों पर आ गई. खेतों में मेहनत-मजदूरी कर मां ने बेटे की पढ़ाई जारी रखी. दूसरी ओर सालु ने भी हालात के आगे घुटने नहीं टेके. गांव से स्कूल करीब 10 किलोमीटर दूर था. सालु रोज सुबह करीब 5 बजे साइकिल लेकर निकल जाते और पढ़ाई पूरी करने के बाद दोपहर करीब 3 बजे घर लौटते. रास्ता लंबा था, साधन सीमित थे और कई बार पेट में खाना तक नहीं होता था. फिर भी पढ़ाई नहीं रुकी.
संघर्ष के सफर ने कामयाबी के मुकाम तक पहुंचाया
साइकिल के पैडल से यूनिवर्सिटी की मेरिट लिस्ट तक संघर्ष के इसी सफर ने एक दिन उन्हें कामयाबी के मुकाम तक पहुंचाया. सालु मुर्मू ने लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल कॉलेज, करनडीह से संताली ऑनर्स की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद कोल्हान विश्वविद्यालय से संताली में एमए किया और पूरी यूनिवर्सिटी में दूसरा स्थान हासिल किया. यह उपलब्धि उस युवा के लिए खास थी, जिसने कभी स्कूल पहुंचने के लिए रोजाना 10 किलोमीटर साइकिल चलाई थी.
200 से ज्यादा बच्चों को मुफ्त में पढ़ा रहे ओलचिकी
लेकिन सफलता की इस सीढ़ी पर पहुंचने के बाद सालु रुके नहीं. उन्होंने तय किया कि जिस शिक्षा और संस्कृति ने उन्हें पहचान दी, उसे समाज के उन बच्चों तक भी पहुंचाया जाए, जिनके पास बेहतर अवसर नहीं हैं. आज सालु मुर्मू का अभियान जमशेदपुर के खासमहल स्थित बाहागढ़ में आकार ले चुका है. ट्राइबल कल्चर सोसाइटी के जरिए वे 200 से अधिक आदिवासी बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दे रहे हैं.
समाज की पहचान भाषा से होती है : सालु
इन कक्षाओं में बच्चों को सिर्फ ओलचिकी लिपि या संताली भाषा ही नहीं सिखाई जाती, बल्कि उन्हें अपनी जड़ों, परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक मूल्यों से भी जोड़ा जाता है. सालु का मानना है कि किसी समाज की पहचान उसकी भाषा और संस्कृति से होती है. इसलिए नई पीढ़ी को आधुनिक शिक्षा के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत की जानकारी देना भी जरूरी है. सालु मुर्मू की पहल के पीछे उनके अपने संघर्ष की गहरी छाप दिखाई देती है. उन्होंने अभावों को करीब से देखा है, इसलिए वे चाहते हैं कि आने वाले बच्चों को उन परिस्थितियों से न गुजरना पड़े, जिनसे उन्होंने खुद संघर्ष किया.
अभिभावक भी पहल की कर रहे सराहना
उनका प्रयास अब धीरे-धीरे एक व्यक्ति की पहल से आगे बढ़कर सामाजिक और सांस्कृतिक अभियान का रूप ले रहा है. आसपास के गांवों के बच्चे इससे जुड़ रहे हैं और अभिभावक भी इस पहल की सराहना कर रहे हैं. सालु की कहानी यह संदेश देती है कि संसाधनों की कमी मंजिल की राह रोक सकती है, लेकिन मजबूत इरादों को नहीं. जिस युवक ने कभी 10 किलोमीटर साइकिल चलाकर स्कूल का रास्ता तय किया था, वही आज सैकड़ों बच्चों के लिए शिक्षा और अपनी संस्कृति से जुड़ने का रास्ता बना रहा है.
