जमशेदपुर : झारखंड की राजनीति में बागुन सुम्ब्रुई का नाम उन नेताओं में शुमार है, जिनकी पहचान सिर्फ चुनावी जीत और राजनीतिक पदों तक सीमित नहीं रही. उनका रहन-सहन, बेबाक अंदाज और निजी जिंदगी भी हमेशा चर्चा में रही. शरीर पर धोती, कई बार नंगे पांव और आम लोगों के बीच सहज मौजूदगी उनकी अलग पहचान थी. चाईबासा विधानसभा से चार बार विधायक और सिंहभूम लोकसभा सीट से पांच बार सांसद रहे बागुन सुम्ब्रुई की जिंदगी का एक पहलू ऐसा भी है, जिस पर आज तक खूब बातें होती हैं - उनकी शादियां.
पत्नियों को लेकर सामने आते हैं अलग-अलग दावे
उनकी पत्नियों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहे. कहीं 23 का जिक्र मिलता है, कहीं 28, तो कुछ रिपोर्टों में यह संख्या 50 से ज्यादा और 58 तक बतायी गयी. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि खुद बागुन सुम्ब्रुई ने अलग-अलग समय में पांच पत्नियों के नाम स्वीकार किये थे. ऐसे में उनकी शादी की कहानी सिर्फ एक संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई किस्से और दावे जुड़े हैं.
चाईबासा से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
बागुन सुम्ब्रुई ने पहली बार 1967 में चाईबासा विधानसभा सीट से चुनाव जीता. इसके बाद 1969, 1972 और 2000 में भी विधानसभा पहुंचे. सिंहभूम लोकसभा क्षेत्र से उन्होंने पांच बार जीत दर्ज की. 1977, 1980, 1984, 1989 और 2004 में वे सांसद चुने गये. झारखंड अलग राज्य आंदोलन के दौर में भी बागुन सुम्ब्रुई की सक्रिय भूमिका रही. बिहार सरकार में मंत्री रहने के साथ ही झारखंड गठन के बाद वे विधानसभा के उपाध्यक्ष भी बने. लंबे राजनीतिक जीवन के बावजूद उन्होंने अपनी सादगी वाली छवि नहीं छोड़ी.
जब विधानसभा तक पहुंचा पत्नियों का मामला
बागुन सुम्ब्रुई की शादियों की चर्चा तब और बढ़ गयी, जब उनकी पत्नियों से जुड़ा मामला बिहार विधानसभा तक पहुंचने की बात सामने आयी. बागुन ने खुद बाद के एक साक्षात्कार में इस मामले का जिक्र किया था. एक रिपोर्ट में 28 महिलाओं के दस्तावेजों में बागुन सुम्ब्रुई का नाम पति के तौर पर दर्ज होने की बात कही गयी थी. यहीं से उनके साथ 28 शादियों का आंकड़ा जुड़ गया.
खुद बागुन ने बतायी थी अलग कहानी
अपनी शादियों को लेकर सवाल पूछे जाने पर बागुन सुम्ब्रुई का जवाब भी हमेशा चर्चा में रहा. उनका कहना था कि उनके पास कई महिलाएं अपनी परेशानियां लेकर आती थीं. इनमें विधवा और परित्यक्ता महिलाएं भी शामिल थीं. बागुन का दावा था कि कुछ महिलाएं सरकारी नौकरी या दूसरी सरकारी सुविधाओं का लाभ लेने के लिए भी अपना नाम उनके साथ जोड़ती थीं. उनका कहना था कि उन्होंने जरूरतमंद महिलाओं को संरक्षण देने की कोशिश की.
910 रुपये में लड़ा था पहला चुनाव
बागुन सुम्ब्रुई की जिंदगी का एक और किस्सा उनकी राजनीतिक सादगी को दिखाता है. एक रिपोर्ट के मुताबिक 1967 में जब उन्होंने पहली बार चुनाव लड़ा, तब उनके पास प्रचार के लिए बहुत कम पैसे थे. बताया जाता है कि उन्होंने महज 910 रुपये में पहला चुनाव लड़ा था. प्रचार के दौरान वे साइकिल से घूमते थे और पैसे की जरूरत पड़ने पर अपनी साइकिल तक 125 रुपये में बंधक रख दी थी.
2018 को हुआ बागुन का निधन
22 जून 2018 को बागुन सुम्ब्रुई का निधन हो गया. चाईबासा की राजनीति का यह अनोखा किरदार भले ही आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा और निजी जिंदगी से जुड़े किस्से अब भी कोल्हान की राजनीतिक स्मृतियों का हिस्सा हैं.
