हजारीबाग में ‘सीरते तैय्यबा’ की झलक : 8 स्टॉल में बच्चियों ने मॉडल से दिखाई पैगंबर-ए-इस्लाम की जिंदगी और फुतूहात-ए-इस्लाम की कहानी

हजारीबाग के मदरसा यतीमखाना अल-बनात नूरा में 'सीरते तैय्यबा वा नुमाइश-ए-फुतूहाते इस्लाम' का आयोजन हुआ. मदरसे की बच्चियों ने 8 स्टॉलों पर पैगंबर हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जिंदगी और इस्लामी इतिहास के सुनहरे दौर को मॉडल, क्राफ्ट और लाइव प्रस्तुतियों से पेश किया.


Hazaribagh Exhibition: हजारीबाग शहर के मदरसा यतीमखाना अल-बनात नूरा में रविवार को ‘सीरते तैय्यबा वा नुमाइश-ए-फुतूहाते इस्लाम’ शीर्षक से एक खास प्रदर्शनी का आयोजन किया गया. इस प्रदर्शनी में मदरसे की बच्चियों ने 8 अलग-अलग स्टॉल लगाकर पैगंबर हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुकम्मल जिंदगी और इस्लामी तारीख के सुनहरे दौर को मॉडल, क्राफ्ट और लाइव प्रस्तुति के जरिए पेश किया. कार्यक्रम को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे और बच्चियों की मेहनत की सराहना की.

क्या-क्या दिखा 8 स्टॉल में?

  • विलादत से पहले का दौर: पहले स्टॉल पर हुजूर ﷺ की पैदाइश से पहले के अरब के हालात को मॉडल से दिखाया गया.
  • सफा पहाड़ी का पैगाम: दूसरे स्टॉल पर सफा पहाड़ी पर दी गई पहली दावत और तकरीर को प्रस्तुत किया गया.
  • हिजरत का सफर: तीसरे स्टॉल पर मक्का से मदीना हिजरत की पूरी दास्तान को मॉडल के जरिए जीवंत किया गया.
  • जंगे बदर: चौथे स्टॉल पर इस्लाम की पहली जंग - जंगे बदर की तफसील बताई गई.
  • जंगे उहद: पांचवें स्टॉल पर जंगे उहद के अहम वाकयात दिखाए गए.
  • जंगे खंदक: छठे स्टॉल पर जंगे खंदक की हिकमत और कहानी पेश की गई.
  • सुलह हुदैबिया: सातवें स्टॉल पर सुलह हुदैबिया के समझौते को समझाया गया.
  • फतह मक्का: आठवें और आखिरी स्टॉल पर फतह मक्का के ऐतिहासिक और रहमत भरे वाकये को प्रस्तुत किया गया.

प्रत्येक स्टॉल पर 4 बच्चियों की टीम ने आने वाले लोगों को मॉडल के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

एक महीने की मेहनत का नतीजा

मदरसा के मोहतमिम मौलाना अमजद अली कासमी ने बताया कि इस पूरी नुमाइश को तैयार करने में बच्चियों और असातिजा ने एक महीने तक दिन-रात मेहनत की है. इसमें हाफिज निजामुद्दीन, नीलम बानो, नाहीद अख्तर और फाकरा मेहर निगार की अहम भूमिका रही. स्टॉल की जिम्मेदारी बच्चियों को लीडर के तौर पर दी गई थी. सलीका खानम, नुसरत परवीन, नाजिश, शमा नौशाद, अलीजा साजिद, तमन्ना परवीन, अजमेरी खातून और अल्हेरा परवीन ने अपनी-अपनी टीम को लीड किया.

1967 से इल्म की शमा रोशन कर रहा है यतीमखाना

मौलाना कासमी ने बताया कि मदरसा यतीमखाना अल-बनात नूरा 1967 से संचालित है, जिसके संस्थापक हजरत सैय्यद सफीरुद्दीन शाह थे. यहां यतीम और जरूरतमंद बच्चियों को दीनी तालीम के साथ-साथ आधुनिक और दुनियावी शिक्षा भी दी जाती है. फिलहाल यहां करीब 100 बच्चियां तालीम हासिल कर रही हैं, जिनके रहने, खाने और पढ़ाई का पूरा इंतजाम इंतजामिया कमिटी करती है.

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मदरसा इंतजामिया कमिटी के सदर मतिनुद्दीन, सचिव सारीक नसीम और खजांची शिश आलम हैं. कमिटी में सैय्यद एनामुल हक, डॉ तनवीर, जमीरुद्दीन, मो रिजवानुद्दीन, मशकूर आलम, एहसानुल हक और आफताब आलम शामिल हैं. कार्यक्रम का मुख्य मकसद बच्चियों के दिलों में सीरत-ए-पाक की मोहब्बत और इस्लामी इतिहास की सही समझ पैदा करना था.

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By Arif

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