उक्त बातों की जानकारी देते हुए भगला काली मंदिर सरिया के पुजारी बाबूलाल पांडेय ने बताया कि गणित ज्योतिष के अनुसार जिस महीने में सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती अर्थात एक राशि से सूर्य दूसरी राशि तक नहीं जा पाता. उस महीने में मलमास लग जाता है. वास्तव में सिद्धांत ज्योतिष के अनुसार सौर मास व चंद्र मास के अंतर को समायोजित करने के लिए ऋषि मुनियों ने मलमास की व्यवस्था कर रखी है, जो प्राय: तीसरे वर्ष के अंतराल में आता है. हिंदू पंचांग की मान्यता के अनुसार प्रत्येक तीसरा वर्ष 13 महीना का होता है जिसको पुरुषोत्तम मास की संज्ञा दी गई है.
पुरुषोत्तम महीने में पूजा पाठ का विशेष महत्व
पुरुषोत्तम महीने में पूजा पाठ का विशेष महत्व होता है. जिसमें व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से उपवास,पूजा-पाठ और दान काम करता है. ऐसे व्यक्तियों को पुण्य की प्राप्ति एवं कष्टों से मुक्ति मिलती है. शास्त्रों के अनुसार उत्तम मास के प्रारंभ में भगवान विष्णु की आराधना रक्त चंदन रक्त पुष्प और अक्षत से करनी चाहिए. भगवान को घी, गुड़ और गेहूं के आटे से मीठे पुए बनाकर कांस्य पत्र में फल फूल दक्षिण एवं वस्त्र के साथ भोग लगाकर दान करना चाहिए.
तामसिक भोजन से रहें दूर
श्री पांडेय ने बताया कि धर्म ग्रंथों के अनुसार अधिक मास में नामकरण गृह प्रवेश, पवित्र संस्कार, मुंडन, विवाह, नववधू प्रवेश गृह आरंभ समेत अन्य काम नहीं करना चाहिए. इस मास में तामसिक भोजन यथा मदिरा, लहसुन, प्याज आदि से भी दूर रहना चाहिए. इस मास में वार्षिक श्राद्ध, मृत्युंजय, रुद्राभिषेक, दान, जप आदि कार्य किये जायेंगे.
