आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की 162वीं जयंती : वृक्ष और फूल की शर्त में गुंथा हुआ इतिहास

Mahavir Prasad Dwivedi : ‘सरस्वती’ के संपादक का पद भार संभालने से पहले द्विवेदी जी कवि-आलोचक के तौर पर प्रतिष्ठित हो चुके थे. हिंदी के साथ वह संस्कृत में भी लिखते थे. ‘रसिक-वाटिका’, ‘भारत मित्र’, ‘हिन्दोस्थान’ और ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ आदि पत्रों में उनकी कविताएं और लंबी समीक्षाएं प्रकाशित होती थीं.

Mahavir Prasad Dwivedi : पहले हिंदी पत्र ‘उदंत मार्तंड’ के प्रकाशन के दो सौ साल पूरे हो रहे हैं. इस अवसर पर देश हिंदी पत्रकारिता की द्विशताब्दी मना रहा है. बीसवीं सदी की शुरुआत में ‘सरस्वती’ का प्रकाशन एक आश्चर्य की तरह घटित हुआ था. पहले तीन वर्षों तक उसके संपादन का दायित्व नागरीप्रचारिणी सभा के पास था, पर चौथे साल में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने उसे संभाल लिया. तब कोलकाता से ‘भारत मित्र’, ‘हिंदी बंगवासी’, ‘हितवार्ता’, मुंबई से श्री ‘वेंकटेश्वर-समाचार’, पटना से ‘बिहार-बंधु’ और बनारस से ‘भारतजीवन’ साप्ताहिक प्रकाशित हो रहे थे. राजा रामपाल सिंह कालाकांकरवाला का ‘हिन्दोस्थान’ एकमात्र दैनिक था. बालकृष्ण भट्ट के संपादन में प्रयाग से निकलनेवाला ‘हिंदी प्रदीप’ मासिक था. बिलासपुर से प्रकाशित ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ भी मासिक था.


‘सरस्वती’ के संपादक का पद भार संभालने से पहले द्विवेदी जी कवि-आलोचक के तौर पर प्रतिष्ठित हो चुके थे. हिंदी के साथ वह संस्कृत में भी लिखते थे. ‘रसिक-वाटिका’, ‘भारत मित्र’, ‘हिन्दोस्थान’ और ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ आदि पत्रों में उनकी कविताएं और लंबी समीक्षाएं प्रकाशित होती थीं. पुराने और नये कवियों पर लगातार लिखकर उन्होंने आज लिखी जा रही आलोचना का शिलान्यास कर दिया था. उनकी आलोचना में संकोच, पक्षपात, व्यक्ति के महत्व और झूठ के लिए रत्ती भर जगह न थी. आचार्य द्विवेदी के संपादन में निकलनेवाली ‘सरस्वती’ का पहला साल मुश्किल था. गिरिजादत्त वाजपेयी के एक लेख को छोड़ बाकी सभी लेख उनके लिखे हुए थे.

शुरुआती तीन वर्षों में पत्रिका का संपादन नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा किया गया था और प्रकाशनार्थ आये सभा से प्राप्त लेखों के बंडल में से कोई द्विवेदी जी की पसंद का न था. पत्रिका की ग्राहक संख्या कम हो गयी थी. लेकिन इंडियन प्रेस के मालिक बाबू चिंतामणि घोष के हौसले और द्विवेदी जी की संपादन कला ने उसे संभालकर नयी और नामुमकिन ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया. द्विवेदी जी किसी को छोड़ते नहीं थे. संपादन संभालने के बाद पत्रिका की दूसरी-तीसरी संख्या में उनके लेख ‘हिंदी भाषा और साहित्य’ ने महामना मदन मोहन मालवीय को भी आड़े हाथों लिया था. उस लेख में द्विवेदी जी मालवीय जी से साफ शब्दों में कहते हैं : ‘आप स्वयं हिंदी में लिखा कीजिए और अपने प्रभाव के अधीन सबको हिंदी को ही अपनाने को प्रवृत्त कीजिए.’ द्विवेदी जी के उद्यम ने लोगों को ‘सरस्वती’ की ओर मोड़ दिया. लेखक अपनी सर्वोत्तम रचनाएं ‘सरस्वती’ के लिये भेजने लगे. राधाकृष्ण दास, श्रीधर पाठक, महेंदुलाल गर्ग, राधाचरण गोस्वामी, शिवचंद्र भरतिया, राय देवीप्रसाद पूर्ण, माधवराव सप्रे, गंगाप्रसाद अग्निहोत्री, नाथूराम शंकर शर्मा और देवीप्रसाद मुंसिफ जैसे साहित्यिकों के लेख ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुए.

काशीप्रसाद जायसवाल ने विदेश से लेख भेजे. सत्यनारायण कविरत्न और मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं भी ‘सरस्वती’ के पृष्ठों की शोभा बनीं. लोग मानने लगे कि पत्रिका हो तो ‘सरस्वती’ जैसी, और संपादक हो तो द्विवेदी जी जैसा. मेरठ से प्रकाशित ‘ललिता’ ने अपने आवरण पर ‘सरस्वती’ से टक्कर लेने की बात लिख ही दी. द्विवेदी जी छपने के लिए आयी हरेक रचना को अथ से इति तक पढ़ते थे, धीरज और जतन के साथ उसमें यथोचित संशोधन करते थे-इसके बाद ही वह लेख ‘सरस्वती’ के पृष्ठों पर प्रकाशित हो सकता था. इस कठोर अनुशासन की वजह से कई बार ‘सरस्वती’ के पास रचनाओं की भीड़ इकट्ठा हो जाती थी. बहुत से लेख द्विवेदी जी की परीक्षा में पास नहीं हो पाते थे.

प्रभूत संशोधनों से भी कई बार युवा रचनाकार झुंझला जाते थे. पर द्विवेदी जी का संपादकीय अनुशासन निष्कंप, अटल और अविचलित था. द्विवेदी जी विवादों से घबराते नहीं थे. मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए होनेवाले समर में पूरी बेबाकी और साहस के साथ अपना पक्ष रखने से वह कभी नहीं चूके. ‘सरस्वती’ के पृष्ठों पर हुए वाद-विवाद आज की पत्रकारिता और साहित्य की निधि हैं. ‘सरस्वती’ का कार्यभार संभालने के थोड़े ही समय बाद नागरीप्रचारिणी सभा से उनका विवाद हो गया. तब सभा के तत्वावधान में उत्तर भारत के कोने-कोने में हस्तलिखित हिंदी ग्रंथों की खोज का बहुत बड़ा अभियान चलाया जा रहा था. सभा उन ग्रंथों की खोज रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित करती थी और समीक्षार्थ अंग्रेजी पत्रों के पास ही भेजती थी.

देश-विदेश के विद्वान सभा के इस सद्प्रयत्न की प्रशंसा कर ही रहे थे कि अक्तूबर, 1904 की ‘सरस्वती’ में सभा की 1901 की खोज रिपोर्ट की कड़ी आलोचना प्रकाशित हुई. सभा ने उस आलोचना का प्रतिवाद करते हुए ‘सरस्वती’ के प्रकाशक इंडियन प्रेस के स्वामी चिंतामणि घोष को पत्र लिखा. दिसंबर, 1904 की ‘सरस्वती’ में उस पत्र की भी तीखी आलोचना प्रकाशित हुई, जिस पर सभा के कार्यकर्ता काफी नाराज हुए. उन्होंने इंडियन प्रेस को फिर से पत्र लिखकर ‘सरस्वती’ से अपना अनुमोदन वापस ले लिया. जनवरी, 1905 के पहले तक ‘सरस्वती’ के सभी प्रकाशित अंकों के आवरण पर लिखा रहता था-नागरीप्रचारिणी सभा के अनुमोदन से संस्थित’. आगे से अनुमोदन सूचक वाक्य हटा लिया गया.


फरवरी, 1905 की ‘सरस्वती’ में द्विवेदी जी ने बहुत भारी मन और उतने ही मजबूत संकल्प के साथ ‘अनुमोदन का अंत’ शीर्षक से एक संपादकीय लिखा. उस शोकलेख में ‘सरस्वती’ और सभा का रिश्ता टूट जाने की बात जिस मार्मिक शिल्प में कही गयी है, उसे पढ़कर साहित्य और पत्रकारिता के विद्यार्थी तर्क, शिष्टता और संवेदना के साथ बात रखने की कला सीख सकते हैं. ‘सरस्वती’ का आरंभ नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा हुआ था. चौथे वर्ष में द्विवेदी जी उसके संपादक बने और पांचवें साल, 1905 में सभा-‘सरस्वती’ का संबंध टूट ही गया, पर कटुता और अप्रेम के साथ नहीं, कुछ-कुछ उस उदास गरिमा के साथ, जिसमें एक बेटी अपने मायके से विदा होती है. उस घटना के 130 साल बाद भी नागरीप्रचारिणी सभा, ‘सरस्वती’ और उसके अमर संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी एक-दूसरे से वृक्ष और उसके फूल की तरह एक कोमल शर्त में गुंथे हुए हैं. उन्हें अलग-अलग करके देखने की कोशिश बेमानी है. आज हिंदी के प्रखर संपादक और भाषा निर्माता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की 162वीं जयंती है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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