India alliance : चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को बेशक केरल में सत्ता मिल गयी, लेकिन इंडिया गठबंधन की कमजोरी के संकेत भी दिखने लगे हैं. खासकर तमिलनाडु में कांग्रेस द्वारा विजय को समर्थन देने से डीएमके नाराज है और उसने कांग्रेस के फैसले को पीठ में छुरा घोंपना कहा है. डीएमके ने लोकसभा अध्यक्ष से लोकसभा में अपनी सीटिंग अरेंजमेंट भी कांग्रेस से अलग करने के लिए कहा है.
कांग्रेस और डीएमके के राजनीतिक संबंधों का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है. वर्ष 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद दोनों पार्टियों के रिश्ते बेहद तल्ख हो गये थे. कांग्रेस ने डीएमके पर एलटीटीइ के प्रति नरम रवैया बरतने के आरोप लगाये थे. याद कीजिए, 1998 में कांग्रेस ने राजीव गांधी के हत्यारों को डीएमके द्वारा कथित समर्थन देने का आरोप लगाकर आइके गुजराल सरकार से हाथ खींच लिये थे. पर कुछ वर्षों बाद दोनों दल फिर साथ आये. वर्ष 2004 और 2009 में कांग्रेसनीत यूपीए सरकार में डीएमके अहम सहयोगी बनी. किंतु 2013 में डीएमके ने श्रीलंका के मुद्दे पर यूपीए सरकार का साथ छोड़ दिया था. तो क्या राहुल गांधी ने 2013 का बदला चुकाया है?
दरअसल, राजनीति में वर्षों पुराने अतीत की इतनी अहमियत नहीं होती, जितनी वर्तमान या भविष्य की. इसलिए विजय की टीवीके के साथ जाने का फैसला लेते समय राहुल के जेहन में 2013 तो कतई नहीं होगा, बल्कि इसे महीने भर पहले टीवीके के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन न करने की भूल को सुधारने की कोशिश माना जा सकता है. उल्लेखनीय है कि हालिया विधानसभा चुनावों से पहले राहुल गांधी ने मल्लिकार्जुन खरगे और पार्टी के अन्य पुराने नेताओं की सलाह पर डीएमके के साथ बने रहने का फैसला किया था, जबकि तमिलनाडु कांग्रेस का एक धड़ा, खासकर युवा नेता इससे सहमत नहीं थे. अपनी इस गलती का अहसास राहुल को मतदान वाले दिन ही हो गया था.
तमिलनाडु में त्रिशंकु सदन की स्थिति आते ही राहुल ने कांग्रेस के वर्षों पुराने साझेदार डीएमके से नाता तोड़कर एक्टर ‘थलापति’ विजय की नयी-नवेली पार्टी व सरकार को समर्थन देने में एक पल की भी देरी नहीं लगायी. राहुल के इस फैसले ने नये सियासी समीकरणों को लेकर नयी बहस छेड़ दी है. कुछ हलकों में उनके इस फैसले को भले ही घोर अवसरवादी बताया जा रहा हो, लेकिन स्वयं उनकी अपनी पार्टी ही नहीं, विपक्षी दलों के बीच भी इस घटनाक्रम को उत्सुकता से देखा जा रहा है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के तौर पर रविवार को विजय के शपथ ग्रहण समारोह में उनकी राहुल गांधी के साथ जिस तरह की केमिस्ट्री देखने को मिली, वह दिलचस्प थी. आम तौर पर शपथ ग्रहण समारोह में आने वाले अति विशिष्ट लोग सामने की तरफ आगे वाली कुर्सियों पर बैठते हैं.
मंच पर केवल मुख्यमंत्री या शपथ लेने वाले मंत्री ही बैठते हैं. लेकिन विजय ने राहुल से मंच पर बैठने का विशेष आग्रह किया, जिसे उन्होंने स्वीकार किया. प्रोटोकॉल के हिसाब से यह एक असामान्य बात थी. इस दौरान पूरे तमिलनाडु और देश ने देखा कि कैसे विजय ने राहुल गांधी को सम्मान दिया. मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद विजय ने शुरुआती भाषण में ही स्पष्ट कर दिया कि उनका पूरा जोर सामाजिक न्याय पर रहेगा. राहुल गांधी को भी सामाजिक न्याय पर बातें करना अच्छा लगता है. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान यही मसला उनके प्रचार अभियान के केंद्र में था. लेकिन कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति और उत्तर भारत में उन्हें इसमें उतनी कामयाबी नहीं मिल पायी, जितनी उन्हें उम्मीद थी.
मगर अब ऐसा लगता है कि उन्हें विजय के रूप में समान विचारधारा वाला एक साथी मिल गया है. गौरतलब है कि देश में केवल तीन ऐसे प्रदेश हैं, जहां राहुल गांधी की लोकप्रियता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ज्यादा है. इनमें तमिलनाडु भी एक है (अन्य दो राज्य केरलम और पंजाब हैं). ऐसे में कांग्रेस के एक धड़े को लग रहा है कि राहुल और विजय के रूप में यह युवा जोड़ी अगले लोकसभा चुनावों में कमाल कर सकती है. इस नये गठबंधन के साथ 2029 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस तमिलनाडु में कुछ ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की उम्मीद भी लगा सकती है. पिछले चुनावों में उसे डीएमके से केवल नौ सीटें ही मिली थीं. यह थोड़ा दिलचस्प लग सकता है कि चार मई के बाद से ही कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा गांधी भवन में उत्साह की लहर दिखाई दे रही है.
कांग्रेस का एक खेमा, खासकर राहुल गांधी के करीबी लोगों का मानना है कि पार्टी के पास पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, बिहार, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, दिल्ली, उत्तराखंड, पंजाब और कई अन्य राज्यों में अपने ‘पुराने अच्छे दिन’ वापस लाने का मौका है. इसलिए ‘एकला चलो रे’ अब नया नारा बन गया है और 2029 में ‘200 पार’ का सपना देखा जा रहा है. हालांकि, पार्टी इस कड़वी सच्चाई से मुंह नहीं चुरा सकती कि केरलम को छोड़ दें, तो किसी भी अन्य राज्य में कांग्रेस के लिए लोकसभा में दो अंकों तक पहुंचना मुश्किल दिखाई देता है. पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में, जहां कुल मिलाकर 254 लोकसभा सीटें हैं, कांग्रेस का वोट शेयर फिलहाल सिंगल डिजिट में है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
