प्रखंड क्षेत्र के गोविंदपुर गांव निवासी डुगलाल महतो तथा वजीर मंडल ने बताया कि गोवर्धन पूजा हमें पशु-पक्षियों के अतिरिक्त प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाये रखने की प्रेरणा देती है. यह त्योहार जानवरों के प्रति सम्मान और कृषि के महत्व को दर्शाता है. प्रकृति प्रेम के प्रतीक इस त्योहार में किसान व गौ सेवकों द्वारा अपने-अपने गाय- बैलों को स्नान कराकर उनकी साज सज्जा की जाती है. मेले का आयोजन होता है. मैदान या चौराहे के बीच बैलों को बांधकर परंपरा के अनुसार मांदर बजाकर व सोहराय का गीत गाकर नाचते झूमते बैलों को नचाते हैं. ग्रामीण क्षेत्र के लोग मेले का आनंद लेते हुए अपनी आवश्यकता की वस्तुओं की खरीदी करते हैं. एक दूसरे को मिठाइयां खाते खिलाते हैं.
सुरक्षा के लिए करते हैं पूजा
बताया कि भगवान इंद्र का कुपित हो जाने से मूसलधार वर्षा प्रारंभ हो गई थी. वृंदावन में गोचरण करने गए ग्वाल बाल को भगवान इंद्र के क्रोध से बचने के लिए श्री कृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली पर पहाड़ को उठा लिया था. इसके नीचे लगातार सात दिनों तक ग्वाल-बाल अपने जानवरों के साथ ठहरे. तब से भगवान कृष्ण के इस सुरक्षात्मक स्वभाव को लेकर गोवर्धन पूजा की जाती है. बताते चलें कि सरिया प्रखंड के मोकामो, गोविंदपुर, खूंटा समेत अन्य गांवों में कई दशकों से गोवर्धन पूजा सह बरदखूंटा मेले का आयोजन होता आ रहा है. शांतिपूर्ण तरीके से मेले के आयोजन को संपन्न करने के लिए पुलिस की नियुक्ति भी की गयी थी.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
