आर्मी में भर्ती का सपना नहीं हुआ पूरा, मुर्गा पालन ने रवि को बनाया आत्मनिर्भर; सालाना 7-8 लाख की कमाई

सेना में भर्ती होने का सपना अधूरा रह गया, लेकिन रवि कुमार ने हार नहीं मानी. उन्होंने मुर्गा पालन का रास्ता चुना और आज वह सालाना 7-8 लाख रुपये कमा रहे हैं. उनकी कहानी युवाओं के लिए प्रेरणा है.

गिरिडीह. सेना में भर्ती होकर देश सेवा करने का सपना पूरा नहीं हुआ, लेकिन सदर प्रखंड के युवा रवि कुमार ने हिम्मत नहीं हारी. नौकरी की कोशिशों में सफलता नहीं मिली तो उन्होंने स्वरोजगार का रास्ता चुना और करीब 10 वर्ष पहले मुर्गा पालन शुरू किया. छोटे स्तर से शुरू किया गया यह कारोबार आज उनके परिवार की आर्थिक मजबूती का आधार बन चुका है.

सांकेतिक फोटो

नहीं मिली सफलता तो शुरू किया मुर्गा पालन

रवि कुमार बताते हैं कि इंटर की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सेना में भर्ती की तैयारी शुरू की थी. कई प्रयास किये, लेकिन मेडिकल में सफलता नहीं मिल सकी. इसके बाद उन्होंने रोजगार के लिए मुर्गा पालन को चुना.

शुरुआत में उन्होंने सीमित संख्या में मुर्गे पालकर कारोबार शुरू किया. धीरे-धीरे अनुभव बढ़ा और व्यवसाय का दायरा भी बढ़ता गया. आज मुर्गा पालन उनकी आय का प्रमुख स्रोत बन चुका है.

हर साल 10 से 12 हजार मुर्गे बाजार में भेजते हैं

रवि कुमार के अनुसार, वर्तमान में वह हर वर्ष करीब 10 से 12 हजार मुर्गे बाजार में भेजते हैं. प्रत्येक मुर्गे से औसतन 50 से 60 रुपये की आमदनी होती है. उनके अनुसार, मुर्गा पालन से सालाना करीब 7 से 8 लाख रुपये का मुनाफा हो जाता है.

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उन्होंने बताया कि इस व्यवसाय में लगातार निगरानी और बेहतर प्रबंधन की जरूरत होती है. मुर्गों को समय पर दाना-पानी देना, साफ-सफाई का ध्यान रखना और बीमारी से बचाव के लिए समय पर जरूरी उपाय करना बेहद महत्वपूर्ण है.

बच्चों की पढ़ाई से परिवार का खर्च तक संभाल रहे

रवि कुमार के तीन बच्चे हैं. मुर्गा पालन से होने वाली आमदनी से वह परिवार का खर्च चलाने के साथ बच्चों की पढ़ाई-लिखाई भी कराते हैं. उनका कहना है कि स्वरोजगार ने उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत होने का अवसर दिया.

उनके मुताबिक, नौकरी नहीं मिलने का मतलब यह नहीं है कि युवाओं के सामने रोजगार के रास्ते बंद हो गये. यदि मेहनत, लगन और सही योजना के साथ स्वरोजगार शुरू किया जाये तो उससे भी अच्छी आमदनी हासिल की जा सकती है.

युवाओं के लिए बने प्रेरणा

रवि का सेना में जाने का सपना भले ही पूरा नहीं हुआ, लेकिन मुर्गा पालन ने उन्हें आत्मनिर्भर बनने का रास्ता दिखा दिया. करीब एक दशक की मेहनत के बाद आज वह अपने कारोबार से परिवार की जिम्मेदारियां निभा रहे हैं.

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रवि की कहानी बताती है कि किसी एक अवसर में असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि नये रास्ते की शुरुआत हो सकती है. मेहनत और सही दिशा मिले तो स्वरोजगार के जरिये भी युवा अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं.

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By Vivek Kumar

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