किसान मजदूरी नहीं कोकून उत्पादन की ओर हो रहे अग्रसर

अच्छी खबर. शिकारीपाड़ा के तसर कीट उत्पादक से प्रेरित हो रहे लोग, आत्मनिर्भर बन रहे किसान 12 सौ रुपये लगाकर महज 40 दिनों में कमा रहे 20 से 25 हजार रुपये पालक रेशम दूत की मदद से सहज ही कर रहे कोकून का उत्पादन अग्र परियोजना केंद्र में दो रुपये प्रति कोय की दर से […]

अच्छी खबर. शिकारीपाड़ा के तसर कीट उत्पादक से प्रेरित हो रहे लोग, आत्मनिर्भर बन रहे किसान

12 सौ रुपये लगाकर महज 40 दिनों में कमा रहे 20 से 25 हजार रुपये
पालक रेशम दूत की मदद से सहज ही कर रहे कोकून का उत्पादन
अग्र परियोजना केंद्र में दो रुपये प्रति कोय की दर से बेच कर हो रहे मालामाल
शिकारीपाड़ा : प्रखंड के सुदूर जंगलों में तसर की खेती लोगों के आय वृद्धि का एक महत्वपूर्ण जरिया बन गया है. तसर की खेती से एक ओर जहां वनों की सुरक्षा होती है. वहीं इससे लोगों को भी रोजगार हासिल करने का अवसर मिल रहा है. तसर की खेती आसन व अर्जुन के पेड़ों पर परिवार के छोटे-बड़े सदस्यों की मदद से की जा रही है. इसकी प्रथम फसल जुलाई से सितंबर माह के बीच तैयार होती है. प्रथम फसल में मूलत: पालक रेशम दूत की मदद से कोकून का उत्पादन करते हैं. जिसे तसर कीट पालक कोय कहते हैं.
उत्पादित कोय को अग्र परियोजना केंद्र में दो रुपये प्रति कोय की दर से बेचा जाता है. जिससे कीट पालकों को 12 सौ रुपए की लागत से 40 दिनों में 20 से 25 हजार की आमदनी होती है. उत्पादित कोय से बीजागार में बनी रोग मुक्त चकत्ते ( डीएफएलएस ) द्वितीय फसल के लिए कृषकों के बीच केंद्र अनुदानित दर पर 6 सौ रुपये प्रति पैकेट पर दिया जाता है. तसर की द्वितीय फसल सितंबर से दिसंबर के बीच 60- 65 दिनों में तैयार होती है. द्वितीय फसल में उत्पादित कोकून दर निर्धारण समिति संतालपरगना द्वारा निर्धारित दर पर अग्र परियोजना केंद्र तसर कृषकों से खरीदते हैं. इससे कृषकों को साधारणत: 25-30 हजार की आमदनी होती है.
कोकून उत्पादन से बन रहे आत्मनिर्भर
कोकून उत्पादन से अब यहां के लोग आत्मनिर्भर बनने लगे हैं. लोग मजदूरी नहीं कर कोकून उत्पादन की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं. पिछले वर्ष कुशबोना के सुंदरी हेंब्रम ने प्रखंड में सर्वाधिक 23, 560 कोकून उत्पादित कर 65,968 रु, जामबाद के सूरज हांसदा को 19,036 कोकून के 53,301 रुपये तथा कुशबोना के निंबूलाल मुर्मू 17,000 कोकून के उत्पादित कर 47,600 रु की आमदनी की. उन्हें देख अब अन्य लोग भी इस काम में लग हुए हैं.
बोले पदाधिकारी
तसर कीट पालकों को समय-समय पर प्रशिक्षण, गोष्ठी आदि के जरीये तकनीकी व बीमारियों की रोकथाम की जानकारी दी जाती है. साथ ही उन्हें चूना ब्लीचिंग पाउडर व दवाइयां आदि मुहैया कराया जाता है. कृषकों को बताये गये तकनीक के द्वारा रोग मुक्त चकते उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया जाता है . साथ ही उत्पादित कोकून को प्रमंडल स्तरीय कोकून के दर निर्धारित समिति द्वारा निर्धारित दर पर केंद्र द्वारा कोकून की क्रय की जाती है.
– सुधीर कुमार सिंह, सहायक उद्योग निदेशक, संतालपरगना

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