बाबा की नगरी से गहरा था सुदिव्य सोनू का रिश्ता, श्रद्धालुओं की सेवा को मानते थे बाबा की सेवा
देवघर : सुदिव्य कुमार सोनू अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन देवघर से उनका रिश्ता शायद ही कभी भुलाया जा सके. यह रिश्ता किसी पद, किसी जिम्मेदारी या किसी सरकारी कार्यक्रम तक सीमित नहीं था. बाबा बैद्यनाथ के प्रति उनकी आस्था ने देवघर को उनके लिए एक अलग ही मायने दे दिया था. बाबा की नगरी में आने वाले श्रद्धालुओं की सेवा को वे एक जिम्मेदारी के साथ-साथ बाबा की सेवा का अवसर भी मानते थे.
मेला आने में वक्त था, लेकिन सुदिव्य की तैयारियां पहले ही शुरू हो जाती थीं
श्रावणी मेला शुरू होने में अभी दो-तीन महीने का वक्त होता था, लेकिन सुदिव्य कुमार सोनू की चिंता तब से शुरू हो जाती थी. शासन और प्रशासन के साथ होने वाली बैठकों में वे मेले की तैयारियों के हर पहलू को गंभीरता से लेते थे. अधिकारियों के साथ चर्चा के दौरान उनका सबसे बड़ा सवाल यही होता था कि बाबा धाम आने वाले श्रद्धालुओं को और बेहतर सुविधा कैसे दी जाए. जलार्पण सहज कैसे हो, दर्शन में परेशानी न हो और लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ के बावजूद व्यवस्था सुचारू रहे, इन सवालों के जवाब वे लगातार तलाशते रहते थे.
2026 में भी तकनीक के इस्तेमाल पर रहा विशेष जोर
श्रावणी मेला 2026 की तैयारियों के दौरान भी उनकी यही सोच दिखाई दी. उन्होंने एआई आधारित मैनेजमेंट और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर जोर दिया. उनका मानना था कि श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या और बदलती जरूरतों के साथ बाबा धाम की व्यवस्थाओं को भी आधुनिक बनाना होगा. तकनीक का इस्तेमाल केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की सुविधा और बेहतर भीड़ प्रबंधन के लिए हो, इस पर उनका विशेष जोर रहता था.
हर साल तंबू और ढांचा खड़ा करने के बजाय स्थायी समाधान चाहते थे
सुदिव्य की सोच सिर्फ एक श्रावणी मेला तक सीमित नहीं थी. वे चाहते थे कि देवघर में ऐसी स्थायी व्यवस्थाएं विकसित हों, जिनका फायदा हर साल श्रद्धालुओं को मिले. बार-बार अस्थायी निर्माण और उस पर होने वाले खर्च के बजाय उनका जोर स्थायी निर्माण और उपयोगी आधारभूत संरचनाओं पर रहता था. देवघर को धार्मिक पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की उनकी सोच में यह बात लगातार दिखाई देती थी.
मुख्यमंत्री नहीं पहुंचे तो उद्घाटन की जिम्मेदारी संभालते रहे सुदिव्य
श्रावणी मेला के उद्घाटन को लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी जाने से जुड़ी एक पुरानी धारणा राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय रही है. ऐसे माहौल में पिछले दो-तीन वर्षों से नगर विकास एवं पर्यटन मंत्री के रूप में सुदिव्य कुमार सोनू ही श्रावणी मेला के उद्घाटन की जिम्मेदारी निभाते रहे. लेकिन उनके लिए यह सिर्फ उद्घाटन का मंच नहीं था. वे बाबा की नगरी में आने वाले लाखों भक्तों के बीच खड़े होकर खुद को उस व्यवस्था का हिस्सा मानते थे, जिसका मकसद बाबा के भक्तों को बेहतर सुविधा देना था.
बैठकों में अधिकारी होते थे सामने, लेकिन नजर हमेशा श्रद्धालुओं पर रहती थी
कुशल प्रशासक के रूप में सुदिव्य की अपनी कार्यशैली थी. वे अधिकारियों से सवाल करते थे, सुझाव देते थे और जरूरत पड़ने पर अपनी बात पर दृढ़ भी रहते थे. लेकिन इन तमाम चर्चाओं के केंद्र में एक ही चेहरा रहता था, बाबा का भक्त. वह भक्त जो सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर देवघर पहुंचा है और उम्मीद लेकर आया है कि बाबा बैद्यनाथ का जलार्पण सहजता से कर सके.
देवघर ने एक मंत्री नहीं, बाबा का एक समर्पित भक्त खोया है
सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद देवघर में उनके कामों और उनकी बातों की यादें रह गयी हैं. उनकी पहचान एक कुशल प्रशासक और दृढ़ इच्छाशक्ति वाले मंत्री के रूप में जरूर रही, लेकिन देवघर के लिए उनकी सबसे बड़ी पहचान बाबा बैद्यनाथ के प्रति उनकी अटूट आस्था थी. बाबा की नगरी से उनका लगाव पद के साथ आया और पद के साथ खत्म नहीं हुआ. वह उनके व्यवहार, उनकी प्राथमिकताओं और उनके फैसलों में दिखाई देता रहा. आज सुदिव्य कुमार सोनू नहीं हैं, लेकिन श्रावणी मेला की तैयारियों के बीच उनकी कही बातें, श्रद्धालुओं की सुविधा को लेकर उनकी चिंता और बाबा बैद्यनाथ के प्रति उनकी श्रद्धा देवघर की स्मृतियों में हमेशा बनी रहेगी. बाबा की नगरी से उनका यह आत्मीय रिश्ता ही उनकी सबसे बड़ी याद बनकर रह गया है.
