चतरा से लौट कर मनोज सिंह की रिपोर्ट
चतरा. चतरा के सिमरिया स्थित फतहा के रहनेवाले मो मेराज दिल्ली में गारमेंट एम्ब्रॉयडरी का काम करते थे. उनके हुनर की बाजार में मांग भी थी, पर छह घंटे तक काम करने के बाद उन्हें महज 105 रुपये मिलते थे, जिससे परिवार का गुजारा भी मुश्किल था. यही हाल गांव के मो अबु सादिबा व मो नेसार जैसे अन्य कारीगरों का भी था. हालात ने मो मेराज को घर लौटने पर मजबूर कर दिया.
गांव में शुरू की खुद की गारमेंट एम्ब्रॉयडरी
इसके बाद मेराज ने गांव में ही खुद कर गारमेंट एम्ब्रॉयडरी का काम शुरू किया. 2003 में गांव लौटकर उन्होंनेकाम शुरू किया. पहले घर-घर जाकर युवाओं और महिलाओं को एम्ब्रॉयडरी सिखाई. 2023 में युवाओं की टीम बनाई और 2026 में गांव में क्लस्टर भवन तैयार हुआ.आज गांव के मो. अबु सादिबा, मो. नेसार समेत बड़ी संख्या में कारीगर इसी काम से जुड़े हैं. रोजगार के लिए बाहर गए कई युवा भी वापस लौटकर एम्ब्रॉयडरी से जुड़ गए हैं.
फतहा अब 'एम्ब्रॉयडरी विलेज' के नाम से जाना जाता है
मेराज के हुनर ने पूरे गांव की किस्मत बदल दी है.फतहा अब 'एम्ब्रॉयडरी विलेज' के नाम से जाना जाता है. सिमरिया अनुमंडल से 3 किमी दूर बसे मुस्लिम बहुल फतहा में करीब 150 घर हैं और एक भी कच्चा मकान नहीं है. पहले यहां पढ़ाई का माहौल नहीं था, अब हर बच्चा स्कूल जाता है.
युवा दूसरे राज्यों में जाकर दे रहे हैं एम्ब्रॉयडरी का प्रशिक्षण
फतहा के युवा अब दूसरे राज्यों में जाकर एम्ब्रॉयडरी का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं. वहीं, कुछ साल पहले रोजगार के लिए गांव छोड़ने वाले कई युवा अब लौट आये हैं और एम्ब्रॉयडरी के काम से जुड़ गये हैं.
यहां महिलाएं घरों में एम्ब्रॉयडरी करती हैं, पुरुष क्लस्टर में काम करते हैं. क्लस्टर में काम करने वाले युवाओं को अब प्रति घंटे 50 से 100 रुपये तक मजदूरी मिल रही है. युवा पढ़ाई के साथ यह कला भी सीख रहे हैं.
क्लस्टर में काम करने से कई फायदे
संत जेवियर कॉलेज के अर्थशास्त्र शिक्षक हरिश्वर दयाल के अनुसार क्लस्टर से कारीगरों की बार्गेनिंग क्षमता बढ़ी है. थोक में सस्ता रॉ मैटेरियल मिलता है और बड़े ऑर्डर आसानी से मिल जाते हैं. ग्राहकों को भी एक ही जगह मनचाही डिजाइन और तय कीमत पर उत्पाद मिल जाते हैं. सरकार भी क्लस्टर व्यवस्था को बढ़ावा दे रही है. क्लस्टर को ऋण और अन्य सहयोग आसानी से मिलता है, जिससे अधिक पूंजी उपलब्ध होती है और रॉ मैटेरियल थोक में सस्ता खरीदा जा सकता है.
अब एआई से डिजाइन, पर हाथ का काम जरूरी
मेराज बताते हैं कि अब ग्राहक की मांग पर गूगल और एआई की मदद से नए डिजाइन तैयार कर भेजे जाते हैं. मंजूरी मिलने के बाद ही काम शुरू होता है. हालांकि मेराज अभी भी मानते हैं कि "हाथ से किए गए काम की ही असली कीमत होती है."
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अब भी कर रहे हैं कई चुनौतियां का समान
मेराज की सबसे बड़ी समस्या पूंजी और बिजली है. वे कहते हैं कि झारखंड और दूसरे राज्यों से मांग अच्छी है, पर बिचौलिये मेहनत की उचित कीमत नहीं देते. पूंजी नहीं होने से स्टॉक नहीं रख पाते जबकि बुटीक उनका माल दोगुनी कीमत पर बेचते हैं.
सहयोग मिला, तो आयेगा बदलाव
गांव के युवाओं को सहयोग कर रहे विनर विद यू के राजीव कुमार बताते हैं कि इनको सोलर पैनल और पूंजी की जरूरत है. इसके लिए नाबार्ड सहित कई संस्थाओं से बात भी हुई है. मेराज कहते हैं कि अभी बिजली नहीं रहने से काम में परेशानी होती है. यह अच्छी रोशनी वाला काम है. क्लस्टर में सोलर पैनल लग जाने से फायदा होगा. अगर पूंजी मिल जायेगी, तो एक साथ कई कपड़ा बनाकर रख सकते हैं. अपना उत्पाद बेचने के लिए दूसरों का सहारा नहीं लेना होगा.
मेराज का सफर
- 1999: दिल्ली गए
- 2000: गांव लौटे
- 2003: सिमरिया में खुद का काम शुरू
- 2013: गांव के युवाओं और महिलाओं को प्रशिक्षित किया
- 2026: क्लस्टर भवन में काम
कभी 105 रुपये वाली मजदूरी से शुरू हुआ यह सफर आज पूरे गांव को आत्मनिर्भर बना रहा है.
