आनंद मार्ग प्रचारक संघ की ओर से आनंद नगर में आयोजित आनंद मार्ग धर्म महासम्मेलन में रविवार को कार्यक्रम की शुरुआत प्रभात संगीत, कीर्तन व सामूहिक ध्यान के साथ हुई. संबोधित करते हुए आचार्य विकाशानंद अवधूत ने कहा कि मनुष्य की अंतिम यात्रा स्वयं की ओर लौटना है. संसार जितना बाहरी रूप में विशाल दिखायी देता है, उतना ही भीतर से गहन व रहस्यमय है. मैं कौन हूं और यह सृष्टि किससे बनी है जैसे मूल प्रश्नों का उत्तर खोजने मनुष्य जब निकलता है, तो उसकी यात्रा ब्रह्म की ओर ले जाती है. वही ब्रह्म, जो इस समस्त सृष्टि का आधार, आश्रय व अंतिम सत्य है. सारा ब्रह्मांड उसी के भीतर स्थित है. उसी की चेतना से प्रकाशित है. ‘ब्रह्म’ शब्द का अर्थ ही विस्तार, महानता व शक्ति है, जो सीमित को असीम बना दे.
पुरुष व प्रकृति अलग नहीं हैं
आचार्य ने कहा कि जब मनुष्य छोटे से अहंकार से ऊपर उठ कर विराट सत्ता से जुड़ता है, तो उसके भीतर भी उसी महानता का संचार होने लगता है. यही आध्यात्मिक साधना का मूल उद्देश्य है, अपने सीमित अस्तित्व को असीम में विलीन करना. सृष्टि का यह विस्तार चेतना व प्रकृति के अद्वैत संबंध पर आधारित है. पुरुष व प्रकृति अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो आयाम हैं. एकत्व का प्रकाश है. प्रकाश जीवों के जीवन में आनंद व गति भी भरता है. अंततः वही सबको अपने भीतर समाहित कर लेता है. मौके पर आनंद मार्ग प्रचारक संघ की सांस्कृतिक शाखा ””””रेनेसां आर्टिस्ट्स एंड राइटर्स एसोसिएशन”””” ने प्रभात संगीत पर आधारित सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया.
