Bokaro News : प्रतिनिधि, फुसरो नगर/कसमार. खोरठा भाषा और झारखंडी लोकसंस्कृति की पहचान ‘स्वर कोकिल’ सुरेश कुमार विश्वकर्मा ‘सुकुमार’ (70 वर्ष) का शुक्रवार को निधन हो गया. वह लंबे समय से गंभीर रूप से बीमार थे. बोकारो जिले के नावाडीह प्रखंड की लौह नगरी भेंडरा निवासी सुकुमार को इलाज के लिए वेल्लोर के सीएमसी अस्पताल ले जाया गया था. वहां चिकित्सकीय जांच में बोन कैंसर की पुष्टि हुई थी. इलाज का खर्च वहन नहीं कर पाने के कारण परिजन बिना इलाज कराये उन्हें वापस लेकर घर लेकर लौट रहे थे. इसी दौरान रास्ते में शुक्रवार की सुबह ही उनकी मौत हो गयी. शनिवार को उनका शव भेंडरा स्थित पैतृक आवास पहुंचेगा. इसके बाद जमुनिया नदी तट पर अंतिम संस्कार किया जायेगा. वह अपने पीछे पत्नी, एक पुत्र और तीन पुत्रियों सहित भरा-पूरा परिवार छोड़ गये हैं. उनके पुत्र कुणाल भारती नावाडीह में सरकारी शिक्षक हैं. सुकुमार केवल लोकगायक नहीं, बल्कि साहित्य, गीत और सांस्कृतिक चेतना के सशक्त हस्ताक्षर थे. अपनी मधुर आवाज और संवेदनशील लेखनी के माध्यम से उन्होंने खोरठा भाषा को गांव की चौपाल से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. उनकी रचनाओं में झारखंड की मिट्टी, लोकजीवन, संघर्ष और सामाजिक संवेदनाओं की गहरी छाप दिखायी देती है. आकाशवाणी, दूरदर्शन और विभिन्न सांस्कृतिक मंचों पर उनकी प्रस्तुतियों ने उन्हें जन-जन का प्रिय कलाकार बना दिया. सुकुमार की पहचान केवल उनकी आवाज तक सीमित नहीं रही, उनका विश्व स्तर पर चर्चित गीत ””मांदर बाजे रे…”” झारखंडी संस्कृति का प्रतीक बन गया. मांदर की थाप और लोकधुनों से सजा यह गीत आज भी देश-विदेश में बसे झारखंडी समाज के बीच लोकप्रिय है और सांस्कृतिक आयोजनों की शान माना जाता है. दर्जनों गीतों और कई पुस्तकों के रचनाकार सुकुमार सादगी, विनम्रता और संस्कृति के प्रति समर्पण के लिए भी जाने जाते थे.
Bokaro News : खोरठा के ‘स्वर कोकिल’ सुरेश विश्वकर्मा ‘सुकुमार’ का निधन

Bokaro News : खोरठा के ‘स्वर कोकिल’ सुरेश विश्वकर्मा ‘सुकुमार’ का निधन
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Bokaro News : सुकुमार केवल लोकगायक नहीं, बल्कि साहित्य, गीत और सांस्कृतिक चेतना के थे सशक्त हस्ताक्षर