टेम दग्धन के साथ संपन्न हुआ नव विवाहिताओं का मधुश्रावणी व्रत

मिथिला क्षेत्र अंतर्गत पावन मास सावन में नव विवाहिताओं के लिए आयोजित प्रसिद्ध 15 दिवसीय व्रत मधुश्रावणी का समापन रविवार को परंपरागत विधि-विधान से टेम दग्धन (टेमी दागने) के साथ संपन्न हो गया.

बैरगनिया. मिथिला क्षेत्र अंतर्गत पावन मास सावन में नव विवाहिताओं के लिए आयोजित प्रसिद्ध 15 दिवसीय व्रत मधुश्रावणी का समापन रविवार को परंपरागत विधि-विधान से टेम दग्धन (टेमी दागने) के साथ संपन्न हो गया. इस पर्व का अनुष्ठान मिथिलांचल क्षेत्र नेपाल समेत सूबे के दर्जनों जिले में नव विवाहिता कन्याओं द्वारा अखंड सौभाग्य, सफल वैवाहिक जीवन जीने की कला एवं पति की लंबी आयु के लिए किया जाता है. आदमवान निवासी व महिला पुरोहित मीरा झा ने बताया कि इसका शुभारंभ श्रावण मास के कृष्ण पक्ष पंचमी से होकर शुक्ल पक्ष तृतीया तक चलता है. पौराणिक ग्रंथों में इस व्रत की शुरुआत माता पार्वती द्वारा किए जाने की बात बताई जाती है. इस व्रत को करके माता पार्वती ने शिव को सात जन्म तक पति के रूप में प्राप्त की थी. इस पूरी अवधि में नव विवाहिताएं घरेलू कार्यों से वंचित रहते हुए सात्विक तरीके से ससुराल पक्ष द्वारा भेजे गए भोजन सामग्रियों को एक शाम ग्रहण कर मनोभाव से प्रतिदिन गौरी व माता सीता की पूजा करने के साथ हीं महिला पुरोहित से वैवाहिक जीवन को सफल बनाने वाली रोचक कथाओं का श्रवण करती है. इन कथाओं में सत्यवान-सावित्री, शिव- पार्वती विवाह, सती- अनुसुइया व नाग आदि की कथा शामिल है. बताया गया कि इन कथा में वैवाहिक जीवन में स्थिरता, एक- दूसरे के प्रति समर्पण एवं विकट परिस्थितियों में परिवार का संचालन आदि की शिक्षाप्रद बातें शामिल होती है. वहीं, एक ही शाम भोजन करने की परंपरा से पारिवारिक जीवन में आर्थिक कठिनाइयों को झेलने की कला सिखाई जाती है. इस दौरान नव विवाहित कन्याओं द्वारा प्रतिदिन शाम में समूह में जाकर फूल -पत्तियां इकट्ठा कर घर लाया जाता है, जिससे अगले सुबह पूजा की जाती है. व्रत के अंतिम दिन ससुराल पक्ष से भेजें गए चौदह छोटे- छोटे बर्तनों में दही, फल, मिष्ठान व वस्त्र आदि रखकर पूजा की जाती है एवं टेम दग्धन किया जाता है. इसमें विवाहिता के पति द्वारा उसकी आंखों को बंद कर उसके घुटनों पर दागने की रस्म पूरी की जाती है, जिसका मूल उद्देश्य पति- पत्नी में समर्पण व विश्वास पैदा करना माना जाता है. 14 सुहागिन महिलाओं को खोईंछा देकर सुहागन महिलाओं समेत ससुराल पक्ष से पहुंचे बुजुर्गों से आशीर्वाद लेकर अखंड सौभाग्य की कामना की जाती है. वर्तमान आधुनिक युग में मिथिलांचल की इस लौकिक परंपरा को जीवित रखते हुए सफल समर्पित वैवाहिक जीवन जीने की कला सिखाई जा रही है जो एक सराहनीय कदम है.

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Author: VINAY PANDEY

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