मढ़ौरा के अमर शहीद राम जीवन सिंह: 18 साल की उम्र में सीने पर खायी गोली, भारत छोड़ो आंदोलन में दी शहादत

जानें 18 साल की उम्र में देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले राम जीवन सिंह की अविश्वसनीय कहानी. मढ़ौरा के लाल की देशभक्ति और साहस की यह गाथा आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है.

Ram Jivan Singh: वर्ष 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन देश के स्वतंत्रता संग्राम का एक स्वर्णिम अध्याय है. इसी महान आंदोलन में मां भारती की स्वतंत्रता के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीद राम जीवन सिंह का बलिदान आज भी इतिहास के पन्नों में अमर है. मढ़ौरा की माटी के इस लाल की वीरता की कहानी आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है.

लेरुआ गांव निवासी राम जीवन सिंह तीन भाइयों में मझले थे और महज 18 वर्ष की उम्र में मैट्रिक के अत्यंत मेधावी छात्र थे. अमर शहीद भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के विचारों से प्रभावित राम जीवन सिंह के जीवन में देशभक्ति सर्वोपरि थी.

शादी के बाद भी देश की आजादी को बनाया सर्वोच्च लक्ष्य

संयोगवश राम जीवन सिंह की शादी वर्ष 1942 के आषाढ़ महीने में हुई थी. नवविवाहित जीवन की शुरुआत करने के बजाय उनके मन में देश की आजादी की चिंता समाई हुई थी. अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चल रहे आंदोलन में उन्होंने सक्रिय रूप से भाग लिया और देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया.

महता गाछी में जुटे थे हजारों लोग

भारत छोड़ो आंदोलन के शोधकर्ता उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के विवेकानंद सिंह के अनुसार, 18 अगस्त 1942 को मढ़ौरा के महता गाछी में सारण जिला कांग्रेस कमेटी की नेत्री रामस्वरूप देवी के नेतृत्व में विशाल जनसभा आयोजित की गयी थी.

इस ऐतिहासिक सभा का मुख्य उद्देश्य सारण इंजीनियरिंग वर्क्स लिमिटेड की फैक्ट्री पर अधिकार करना था. उस समय इस फैक्ट्री में द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए बमों के खोल तैयार किये जा रहे थे.

मूसलाधार बारिश के बावजूद हजारों की संख्या में लोग सभा में डटे हुए थे. इसी दौरान अंग्रेजी हुकूमत की टॉमी फौज की एक टुकड़ी वहां पहुंची और सभा को तत्काल भंग करने का आदेश दिया.

अंग्रेज सैनिक ने सीने में मारी गोली

अंग्रेजी हुकूमत के आदेश के खिलाफ युवा राम जीवन सिंह ने डटकर विरोध किया. उनकी निडरता से गुस्साए एक अंग्रेज सैनिक ने उनके सीने में गोली दाग दी. गोली लगते ही राम जीवन सिंह मौके पर ही शहीद हो गये और देश की आजादी के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दिया.

महज 18 वर्ष की उम्र में उनकी शहादत ने मढ़ौरा में अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनाक्रोश को और तेज कर दिया.

1970 में बनाया गया शहीद स्मारक

शहीद राम जीवन सिंह के अदम्य साहस और बलिदान की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए वर्ष 1970 में मढ़ौरा हाई स्कूल के समीप भव्य शहीद स्मारक का निर्माण कराया गया.

स्मारक के उद्घाटन के अवसर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय ने कहा था कि राम जीवन सिंह की शहादत के बाद उपजे जनाक्रोश की गूंज सीधे लंदन की संसद तक पहुंची थी.

राम जीवन सिंह की शहादत आज भी मढ़ौरा के स्वाभिमान और देशभक्ति का अमर प्रतीक है. उनकी वीरता और बलिदान आने वाली पीढ़ियों को देश के लिए समर्पण और संघर्ष की प्रेरणा देता रहेगा.

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By मनोकामना सिंह

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