तरैया. प्रखंड के तरैया-मढ़ौरा मुख्य मार्ग एसएच 73 पर अवस्थित गंडक नहर पुल के दोनों तरफ कचरे का अंबार लगा हुआ है. गंडक नहर पुल के समीप मुर्गा, बकरे की मिट तथा मछली दुकानदारों द्वारा फेंके गये कचरे की दुर्गंध से आसपास के लोग व राहगीर परेशान हैं.
गंडक नहर पुल के दोनों तरफ कचरे का अंबार लगा हुआ है. सिंचाई और जल संरक्षण का मुख्य स्रोत रही यह नहर अब कूड़े और सड़ी-गली गंदगी की जगह बन गयी है. नहर के किनारे बसे आसपास के लोग दुर्गंध से परेशान हैं, लेकिन शासन-प्रशासन की चुप्पी ने समस्या को और गंभीर बना दिया है. नहर में अब जल प्रवाह कम ही रहता है, लेकिन गंदगी लगातार बढ़ती जा रही है. लोग घरेलू कचरा, पॉलीथिन, फल, सब्जी व मांस तथा मछली के अवशेष सीधे नहर में डाल देते हैं. मुरलीपुर के समीप खुले में मांस व मछली की बिक्री होती है और दुकानदार बचा हुआ कचरा नहर में फेंक देते हैं. दुर्गंध इतनी बढ़ गयी है कि आसपास के घरों में रहना मुश्किल हो गया है. मच्छरों और संक्रमण का खतरा भी बढ़ गया है. लोगों का कहना है कि कई बार शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई. नहर में कचरा फेंकना आम बात हो गया है, जिससे पर्यावरण पर संकट मंडराता नजर आ रहा है.कागजों पर सिमटी कचरा प्रबंधन व्यवस्था
तरैया बाजार से निकलने वाला ठोस कचरा सीधे नहर में डाल दिया जाता है. प्रखंड और पंचायत स्तर पर बनाये गये कचरा डंपिंग स्थल और सफाई योजना सिर्फ फाइलों में सिमट कर रह गया है. कचरे के उठाव और निस्तारण के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं है. स्थानीय लोगों के लिए डंपिंग योजना कागज पर ही सिमट कर रह गयी है.जलस्रोतों में कचरा डालने पर सजा का है प्रावधान
भारत में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1974 और घन अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 के तहत किसी भी जलस्रोत में कचरा या गंदगी फेंकना दंडनीय अपराध है. इन कानूनों के तहत नहर, नदी या तालाब में कचरा डालने वालों पर जुर्माना और सजा दोनों का प्रावधान है. वहीं, खुले में मांस या पशु उत्पादों की बिक्री बिना स्वीकृति के खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2006 का भी उल्लंघन है. स्थानीय लोगों की मांग है कि नहर की सफाई के साथ ही गंदगी फैलाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाये. सरकार स्वच्छ भारत मिशन चला रही है. लेकिन, यहां हालात बिल्कुल उलट है. अगर जल्द कदम नहीं उठाया गया, तो नहर सिर्फ गंदगी का ढेर बनकर रह जायेगा. गंडक नहर की बदहाल स्थिति सिर्फ सफाई की लापरवाही नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी की विफलता है. पर्यावरण को स्वच्छ रखने की शुरुआत प्रशासनिक आदेशों से नहीं, बल्कि जनजागरूकता और सामाजिक जिम्मेदारी से होगी.
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