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Sunday, March 3, 2024

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बिहार के हर दूसरे गांवों में तीन महिलाएं डायन प्रताड़ना की शिकार, सरकार जल्द जारी करेगी टोल फ्री नंबर

इस कुरीति से पीड़ित ज्यादातर महिलाएं अशिक्षित, पिछड़ी और दलित जाति की, अधेड़ उम्र की और संसाधन विहीन होती हैं. वे अपनी नेतृत्व क्षमता और मुखर होने की वजह से भी डायन करार दी जाती हैं.

पटना. डायन प्रथा के नाम पर हो रहे उत्पीड़न के खिलाफ देश में सबसे पहले कानून बनाने के बावजूद बिहार में डायन बता कर आज भी महिलाओं के साथ उत्पीड़न हो रहा है. इस कानून का कोई लाभ अमूमन पीड़ित महिला को नहीं मिलता है. पंचायती राज संस्थाएं खुद तो इस कानून से अनभिज्ञ हैं ही, वे कई दफा इस तरह के उत्पीड़न में भी सहभागी हो जाती हैं. इस कुरीति से पीड़ित ज्यादातर महिलाएं अशिक्षित, पिछड़ी और दलित जाति की, अधेड़ उम्र की और संसाधन विहीन होती हैं. वे अपनी नेतृत्व क्षमता और मुखर होने की वजह से भी डायन करार दी जाती हैं. ये बातें महिला साक्षरता पर 1993 से काम कर रही संस्था निरतंर के एक सर्वेक्षण में सामने आयीं, जिसे आज राजधानी पटना में एक आयोजन के दौरान जारी किया गया.

डायन प्रताड़ना कानून को मजबूत करे सरकार

निरंतर ने ये सर्वे ईजाद, रोहतास की संस्था परिवर्तन, सात जिलो में काम कर रही महिला समाख्या फेडरेशन के सहयोग से किया है. इस मौके पर मौजूद बिहार राज्य महिला आय़ोग की अध्यक्ष अश्वमेध देवी ने कहा कि आयोग ऐसे मामलों को लेकर गंभीर है. हम सरकार को ये प्रस्ताव देंगें कि डायन प्रताड़ना कानून को मजबूत करे और इसके लिए एक टॉल फ्री नंबर जारी करें.

मुख्य बिंदू

  • -कड़े कानून के बावजूद 90 फीसदी पीडित महिलाओं की नहीं होती सुनवाई

  • -मुखर नेतृत्व की वजह से डायन करार दी जाती हैं, 56 फीसदी प्रताड़ित महिलाएं

  • – ज्यादातर पीड़ित अधेड़ उम्र की, अशिक्षित, पिछड़ी, और दलित और संसाधन विहीन

  • -निरंतर संस्था द्वारा बिहार में डायन उत्पीड़न को लेकर किये सर्वे के आंकड़े जारी

  • -महिला आयोग की अध्यक्ष अश्वमेध देवी ने कहा, जारी करेंगे टोल फ्री नंबर

  • -एससी-एसटी कमीशन के सदस्य अशोक पासवान ने भी कड़े कदम उठाने का भरोसा दिलाया

लिंग आधारित हिंसा को लेकर संवेदनशील बनें

वहीं मौके पर मौजूद बिहार राज्य कानूनी सेवा प्राधिकार की सदस्य सचिव शिल्पी सोनिराज ने कहा, हम लिंग आधारित हिंसा को लेकर संवेदनशील हैं, पीड़ित टोल फ्री नंबर 15100 पर कभी भी शिकायत कर सकते हैं. इसी संस्था की संयुक्त सचिव धृति जसलीन शर्मा ने कहा, अपने बच्चों को महिलाओं के साथ सम्मान रखना सिखायें, तभी ऐसे सामाजिक अपराध खत्म होंगे. राज्य एससी-एसटी आयोग के सदस्य अशोक पासवान ने डायन कुप्रथा पर काम कर रही महिला संगठनों से एक प्रस्ताव मांगा ताकि डायन प्रताड़ना के कानून को व्यापक बनाया जा सकें.

सर्वे के आंकड़े प्रस्तुत

निरंतर संस्था ने ये सर्वे बिहार के 10 जिलों के 37 प्रखंडों के, 81 पंचायतों के 118 अलग-अलग गांवों की उन 145 पीड़ित महिलाओं के बीच साल 2023 में किया है. सर्वे के आंकड़े प्रस्तुत करते हुए निरंतर की संतोष शर्मा ने कहा कि साल 2022 में डुमरिया में एक महिला को डायन कहकर जिंदा जला दिया गया था जिसके बाद संस्था ने ये सर्वे करने का फैसला लिया.

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इस सर्वेक्षण के प्रमुख आंकड़े

  • -75 फीसदी से अधिक महिलाओं की उम्र 45 साल से अधिक थीं

  • -97 फीसदी पीड़ित महिलाएं पिछड़ी-अतिपिछड़ी और दलित समुदाय से संबंधित थीं.

  • -73 फीसदी पीड़ित महिलाएं कभी स्कूल नहीं गयीं.

  • -75 फीसदी पीड़ित महिलाएं शादीशुदा थीं, इसलिए यह भ्रम की शादी के बाद महिलाओं को सुरक्षा मिल जाती हैं, गलत साबित हुआ.

  • -66 फीसदी पीड़ित महिलाओं के पास कोई रोजगार नहीं था, जिन महिलाओं के पास रोजगार था भी उनमें 68 फीसदी दैनिक मजदूरी करती रही हैं.

  • -48 फीसदी महिलाएं अपने ससुराल के सदस्यों द्वारा डायन करार दी जाती हैं.

  • -44 फीसदी उच्च जाति के लोगों द्वारा डायन करार दी जाती हैं.

  • -56 फीसदी पीड़ित महिलाएं अपनी लीडरशिप क्वालिटी की वजह से डायन प्रताड़ना का शिकार होती हैं.

  • -31 फीसदी पीड़ित महिलाएं हीं प्रताड़ना की शिकायत करती हैं, शिकायत करने पर भी इनमें दो तिहाई मामलों में सुनवाई नहीं होती.

  • -इस मामले में पंचायतों की भूमिका नकारात्मक रहती हैं. हमने जिन 81 पंचायतों से संपर्क किया उनमें से 69 को डायन प्रथा निषेध कानून की जानकारी नहीं थी.

  • -इनमें से सिर्फ 5 फीसदी पंचायतों ने इस मसले पर कभी अपने पंचायत में इस विषय पर चर्चा की थी.

हमारे समाज के ढांचे में मौजूद है यह प्रथा

निरंतर संस्था की निदेशक अर्चना द्विवेदी ने कहा कि डायन कुप्रथा का मामला सिर्फ अंधविश्वास या अशिक्षा का ही नहीं है बल्कि ये हमारे समाज के ढांचे में मौजूद है. इस मौके पर डायन प्रताड़ना से पीड़ित और डायन प्रथा पर किए गए सर्वे की कार्यकर्ता महिलाओं का थर्ड आई पोर्टल की हिंदी संपादक सुमन परमार और जूही का बनाया एक पॉडकास्ट भी सुनाया गया.

पिड़ितों ने बताया अपना दर्द

इस पॉडकास्ट में इन महिलाओं ने इस सवाल के जवाब दिए थे कि डायन किसे कहा जाता है, किस-किस तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ती और पुलिस का क्या रोल होता है. पश्चिमी चंपारण से आई जुलेखा खातून जो खुद भी डायन प्रथा की पीड़ित थी, उन्होंने बताया कि किस तरह उन्हें डायन करार देकर उनके हाथ-पांव तोड़ दिये गये थे. आज भी डायन के नाम पर उनके साथ भेदभाव होता है.

बिहार में कानून कमजोर

इस कार्यक्रम का आयोजन निरंतर संस्था के साथ साथ बिहार लीगल नेटवर्क और महिला समाख्या फेडरेशन महासंघ ने किया था. बिहार लीगल नेटवर्क की सविता अली ने कहा कि डायन प्रताड़ना का कानून बिहार में बना है लेकिन ये बहुत कमजोर है, जिसे संवेदनशीलता और जागरूकता के साथ मजबूत करने की जरूरत है.

ये रहे मौजूद

कार्यक्रम में बिहार लीगल नेटवर्क के नंद कुमार सागर, लेखक एवं महिला अधिकार कार्यकर्ता निवेदिता झा, सामाजिक कार्यकर्ता कामायनी, ज्ञान विज्ञान समिति के असगर सरीन, महिला जागरण केन्द्र की नीलू, महिला समाख्या महासंघ की संगीता, ईजाद की अख्तरी बेगम समेत कई लोगों ने अपनी राय रखी.

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