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Monday, February 26, 2024

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रिश्ते में जहर घोल रहे सोशल मीडिया पर लाइक और कमेंट्स, युवाओं की सेहत पर भी पड़ रहा असर

अभिभावकों ने पहले ध्यान नहीं दिया अब जब किशोर और युवाओं में इसकी लत पड़ गयी तो वह इससे जबरन छुड़वाना चाहते हैं. खून के रिश्तों को दुश्मन मान लेने की प्रवृत्ति मन, दिमाग में पनप रही है. सोशल मीडिया से अत्यधिक मोह किशोर व युवाओं की मन, दिमाग की स्थिति को बदल रहा है.

आनंद तिवारी, पटना. सोशल मीडिया की दुनिया किशोर व युवाओं को सबसे ज्यादा अन सोशल बना रही है. परिवार, रिश्तेदार तो छोड़िए स्वभाव में नकारात्मक बदलाव आने के पीछे भी लाइक और कमेंट्स के प्रति अत्यधिक मोह की बात सामने आयी है. इनमें कभी आने से इतने चिड़चिड़े हो रहे हैं कि उनमें माता-पिता और अपने परिवार के सदस्यों को ही दुश्मन और आत्महत्या के विचार तेजी से पनप रहे हैं. शहर के आइजीआइएमएस के मानसिक रोग विभाग के डॉक्टरों ने पाया कि अभिभावकों ने पहले ध्यान नहीं दिया अब जब किशोर और युवाओं में इसकी लत पड़ गयी तो वह इससे जबरन छुड़वाना चाहते हैं. खून के रिश्तों को दुश्मन मान लेने की प्रवृत्ति मन, दिमाग में पनप रही है.

आभासी दुनिया को मान बैठे वास्तविक

आइजीआइएमएस के उपनिदेशक डॉ मनीष मंडल ने बताया कि सोशल मीडिया से अत्यधिक मोह किशोर व युवाओं की मन, दिमाग की स्थिति को बदल रहा है. संस्थान के मनोचिकित्सा विभाग में इस तरह के युवाओं का केस आ रहे हैं. बीते छह महीने में करीब 80 इस तरह के युवाओं की काउंसिलंग कर उन्हें मोबाइल सोशल मीडिया के रिल्स को छोड़वाया जा रहा है. अच्छी बात तो यह है कि आधे से अधिक बच्चों में सुधार देखने को मिला. उन्होंने बताया कि काउंसलिंग में यह साफ हुआ है कि वह सोचते हैं कि जितने लाइक्स, कमेंट होंगे आप उतना ही आगे जायेंगे. कम होने पर हताशा बढ़ जाती है.

Also Read: बिहार: सोशल मीडिया पर DIG से लेकर निगरानी के डीजी तक का बना फेक अकाउंट, थानेदार से भी ठगी का किया प्रयास

13 से 20 साल के किशोर व युवक

मनोचिकित्सक डॉ सौरभ कुमार के अनुसार सोशल मीडिया के मोबाइल की लत से पीड़ित किशोर व युवक दोनों शामिल हैं. सबसे अधिक 12 से 20 साल के किशोर व युवक ओपीडी में आ रहे हैं. इनमें लड़के व लड़ियां दोनों शामिल हैं. काउंसलिंग के दौरान इन बच्चों में बात-बात पर चिड़चिड़ापन और परिजनों से बेरुखीं देखी जा रही हैं. कई तो ऐसे भी हैं जिन्हें अपनी सेहत तक का भी ख्याल नहीं है. भूख-प्यास की भी चिंता नहीं है. घर-परिवार और आसपास क्या हो रहा, इसकी खोज-खबर लेने में दिलचस्पी नहीं है.

केस 1

शहर के बाकरगंज के रहने वाले एक मोबाइल दुकानदार के 16 वर्षीय बेटा कई घंटे तक सोशल मीडिया पर एक्टिव रहता है. बात-बात पर पोस्ट करने की उसकी आदत से परिजन परेशान हो चुके हैं. रोकते हैं तो वह अपने माता-पिता को न केवल भला-बुरा कहता है, बल्कि उनसे कई दिनों से बात भी नहीं करता.

केस 2

12वीं का छात्र पढ़ाई में अच्छा था. लेकिन बीते छह माह से वह लगातार पिछड़ता जा रहा है. कारण सोशल मीडिया में ज्यादा समय देना. लाइक्स और कमेंट को ही वह इन्हें ही तरक्की की गारंटी मान चुका है. जिस दिन ज्यादा लाइक्स आते हैं उस दिन खुश दिखता है. कम अपने पर लड़ने लगता है. मोबाइल का लत छुड़ाने के लिए परिजन आइजीआइएमएस में इलाज करा रहे हैं.

क्या कहती हैं विशेषज्ञ

ऐसे में अगर बचपन से ही स्मार्टफोन की आदत बच्चों में न डाली जाये तो इससे उनके बाद के जीवन में अच्छा प्रभाव पड़ेगा और युवा पीढ़ी स्वस्थ भी रहेगी. क्योंकि हर दिन 3 घंटे मोबाइल यूज करने से बच्चों को डिप्रेशन और एंजायटी जैसी स्वास्थ परेशानियां हो रही हैं. इससे बचने के लिए माता-पिता बच्चों की गतिविधियों पर जरूर ध्यान दें. बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल का समय तय करें. किन चीजों के बारे में ज्यादा उत्सकुता है वह भी जानें.

-डॉ ऋतु रंजन, मानवाधिकार विशेषज्ञ व सोशल एक्टिविस्ट.

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अभिभावकों ने पहले ध्यान नहीं दिया अब जब किशोर और युवाओं में इसकी लत पड़ गयी तो वह इससे जबरन छुड़वाना चाहते हैं. खून के रिश्तों को दुश्मन मान लेने की प्रवृत्ति मन, दिमाग में पनप रही है. सोशल मीडिया से अत्यधिक मोह किशोर व युवाओं की मन, दिमाग की स्थिति को बदल रहा है.

आनंद तिवारी, पटना. सोशल मीडिया की दुनिया किशोर व युवाओं को सबसे ज्यादा अन सोशल बना रही है. परिवार, रिश्तेदार तो छोड़िए स्वभाव में नकारात्मक बदलाव आने के पीछे भी लाइक और कमेंट्स के प्रति अत्यधिक मोह की बात सामने आयी है. इनमें कभी आने से इतने चिड़चिड़े हो रहे हैं कि उनमें माता-पिता और अपने परिवार के सदस्यों को ही दुश्मन और आत्महत्या के विचार तेजी से पनप रहे हैं. शहर के आइजीआइएमएस के मानसिक रोग विभाग के डॉक्टरों ने पाया कि अभिभावकों ने पहले ध्यान नहीं दिया अब जब किशोर और युवाओं में इसकी लत पड़ गयी तो वह इससे जबरन छुड़वाना चाहते हैं. खून के रिश्तों को दुश्मन मान लेने की प्रवृत्ति मन, दिमाग में पनप रही है.

आभासी दुनिया को मान बैठे वास्तविक

आइजीआइएमएस के उपनिदेशक डॉ मनीष मंडल ने बताया कि सोशल मीडिया से अत्यधिक मोह किशोर व युवाओं की मन, दिमाग की स्थिति को बदल रहा है. संस्थान के मनोचिकित्सा विभाग में इस तरह के युवाओं का केस आ रहे हैं. बीते छह महीने में करीब 80 इस तरह के युवाओं की काउंसिलंग कर उन्हें मोबाइल सोशल मीडिया के रिल्स को छोड़वाया जा रहा है. अच्छी बात तो यह है कि आधे से अधिक बच्चों में सुधार देखने को मिला. उन्होंने बताया कि काउंसलिंग में यह साफ हुआ है कि वह सोचते हैं कि जितने लाइक्स, कमेंट होंगे आप उतना ही आगे जायेंगे. कम होने पर हताशा बढ़ जाती है.

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13 से 20 साल के किशोर व युवक

मनोचिकित्सक डॉ सौरभ कुमार के अनुसार सोशल मीडिया के मोबाइल की लत से पीड़ित किशोर व युवक दोनों शामिल हैं. सबसे अधिक 12 से 20 साल के किशोर व युवक ओपीडी में आ रहे हैं. इनमें लड़के व लड़ियां दोनों शामिल हैं. काउंसलिंग के दौरान इन बच्चों में बात-बात पर चिड़चिड़ापन और परिजनों से बेरुखीं देखी जा रही हैं. कई तो ऐसे भी हैं जिन्हें अपनी सेहत तक का भी ख्याल नहीं है. भूख-प्यास की भी चिंता नहीं है. घर-परिवार और आसपास क्या हो रहा, इसकी खोज-खबर लेने में दिलचस्पी नहीं है.

केस 1

शहर के बाकरगंज के रहने वाले एक मोबाइल दुकानदार के 16 वर्षीय बेटा कई घंटे तक सोशल मीडिया पर एक्टिव रहता है. बात-बात पर पोस्ट करने की उसकी आदत से परिजन परेशान हो चुके हैं. रोकते हैं तो वह अपने माता-पिता को न केवल भला-बुरा कहता है, बल्कि उनसे कई दिनों से बात भी नहीं करता.

केस 2

12वीं का छात्र पढ़ाई में अच्छा था. लेकिन बीते छह माह से वह लगातार पिछड़ता जा रहा है. कारण सोशल मीडिया में ज्यादा समय देना. लाइक्स और कमेंट को ही वह इन्हें ही तरक्की की गारंटी मान चुका है. जिस दिन ज्यादा लाइक्स आते हैं उस दिन खुश दिखता है. कम अपने पर लड़ने लगता है. मोबाइल का लत छुड़ाने के लिए परिजन आइजीआइएमएस में इलाज करा रहे हैं.

क्या कहती हैं विशेषज्ञ

ऐसे में अगर बचपन से ही स्मार्टफोन की आदत बच्चों में न डाली जाये तो इससे उनके बाद के जीवन में अच्छा प्रभाव पड़ेगा और युवा पीढ़ी स्वस्थ भी रहेगी. क्योंकि हर दिन 3 घंटे मोबाइल यूज करने से बच्चों को डिप्रेशन और एंजायटी जैसी स्वास्थ परेशानियां हो रही हैं. इससे बचने के लिए माता-पिता बच्चों की गतिविधियों पर जरूर ध्यान दें. बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल का समय तय करें. किन चीजों के बारे में ज्यादा उत्सकुता है वह भी जानें.

-डॉ ऋतु रंजन, मानवाधिकार विशेषज्ञ व सोशल एक्टिविस्ट.

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