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Thursday, February 29, 2024

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बिहारी राजनीति की यात्रा कर्पूरी ठाकुर से लालू-जगन्नाथ तक

सुरेंद्र किशोर राजनीतिक िवश्लेषक यह संयोग ही था कि बुधवार को पटना में एक तरफ नेता दिवंगत कर्पूरी ठाकुर को ‘भारतरत्न’ देने की मांग कर रहे थे तो दूसरी ओर रांची की सीबीआई अदालत कुछ बड़े नेताओं को सजा सुना रही थी़ पर, यह संयोग नहीं था कि भ्रष्टाचार के आरोप में जिन नेताओं को […]

सुरेंद्र किशोर
राजनीतिक िवश्लेषक
यह संयोग ही था कि बुधवार को पटना में एक तरफ नेता दिवंगत कर्पूरी ठाकुर को ‘भारतरत्न’ देने की मांग कर रहे थे तो दूसरी ओर रांची की सीबीआई अदालत कुछ बड़े नेताओं को सजा सुना रही थी़ पर, यह संयोग नहीं था कि भ्रष्टाचार के आरोप में जिन नेताओं को सजा हुई, उनमें से एक नेता ने कर्पूरी ठाकुर को उनके जीवन काल में यह सलाह दी थी कि ‘आप पटना के प्रस्तावित विधायक काॅलोनी में अपने लिए एक भूखंड ले लें ताकि आपके नहीं रहने पर भी आपके बाल-बच्चे राजधानी में रह सकें.’ एक अन्य अवसर पर उसी नेता ने दिवंगत ठाकुर के बारे में तत्कालीन बिहार विधानसभा उपाध्यक्ष शिवनंदन पासवान को यह नोट लिखा था कि ‘कर्पूरी जी दो बार मुख्यमंत्री रहे. कार क्यों नहीं खरीद लेते?’
याद रहे कि कर्पूरी जी ने पासवान जी के जरिये उस नेता से थोड़ी देर के लिए उनका वाहन मांगा था. याद रहे कि कर्पूरी जी ने उस नेता की बिना मांगी सलाह ठुकरा दी थी. कर्पूरी जी चाहते थे कि उनके बाल-बच्चे उनके गांव में ही रहें. यह प्रकरण नयी पीढ़ी के नेताओं के लिए एक बड़ी सीख है यदि वे ग्रहण करना चाहें तो. वे तय कर लें कि उन्हें कर्पूरी ठाकुर की जीवनशैली अपनानी है या फिर उन नेताओं की जिन्हें रांची अदालत ने सजा दी है.
डाॅ जगन्नाथ मिश्र पर आरोप : क्या किसी सरकारी सेवक की सेवा वृद्धि के लिए सिफारिशी चिट्ठी लिखने मात्र से ही कोई अदालत किसी नेता को पांच साल की सजा दे सकती है?
यदि ऐसा हुआ तो उस जज की ही सेवा समाप्त हो जायेगी. पर, डाॅ जगन्नाथ मिश्र वर्षों से लगातार यह कहते रहे हैं कि पशुपालन विभाग के क्षेत्रीय संयुक्त निदेशक डाॅ श्याम बिहारी सिन्हा के सेवा विस्तार के लिए सिफारिशी चिट्ठी मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को लिखने के कारण ही मुझे चारा घोटाला केस में फंसा दिया गया. पर किसी पूछने वालेे ने कभी डाॅ मिश्र से यह सवाल नहीं पूछा कि क्या अदालत में मुखबिर दीपेश चांडक ने यह नहीं कहा था कि आप डाॅ सिन्हा के पे-रोल पर थे? क्या आपको डाॅ सिन्हा के कहने पर बारी-बारी से सप्लायर एमएस बेदी ने 50 लाख और गणेश दुबे ने 25 लाख रुपये नहीं दिये थे?
क्या चारा घोटालों के सबसे बड़े सरदार श्याम बिहारी सिन्हा की पुत्रवधू को आपने अपने विवेकाधिकार कोटे से टेलीफोन नहीं दिलवाया था? आपके खिलाफ सांठगांठ के कुछ अन्य सबूत भी सीबीआई को नहीं मिल गये थे?
पत्रकारों की मिलीजुली भूमिका : चारा घोटाले के रहस्योद्घाटन और उसकी सीबीआई जांच के दौरान पत्रकारों की भूमिका भी मिलीजुली ही रही. तब यह बात सामने आयी थी कि चारा माफियाओं ने 55 पत्रकारों को भी पैसे दिये थे.
पर जो पत्रकार चारा घोटालेबाजों के प्रभाव में नहीं आये, उनको उन दिनों और बाद में भी तरह-तरह से प्रताड़ित किया गया. दो वरिष्ठ पत्रकारों की तो नौकरी ही छुड़वा दी गयी. कई को जान से मारने की धमकियां दी गयीं. उनका कसूर यही था कि वे खबरें छाप रहे थे. लिख रहे थे कि यह सब न तो संबंधित नेताओं के लिए ठीक है और न ही बिहार के लिए. पर, तब माहौल इतना डरावना बना दिया गया था कि अनेक पत्रकारों और प्रतिपक्षी नेताओं के लिए अपना काम करना कठिन था.
तलवार जुलूस निकल रहे थे. लोगों को डराया जा रहा था. सीबीआई के बड़े अधिकारी डाॅ यूएन विश्वास ने एक बार कहा था कि मैं जब भी कोलकाता से पटना के लिए निकलता हूं तो अपनी पत्नी से कह कर आता हूं कि शायद मैं न भी लौटूं. आज गुरुवार को भी चाईबासा कोषागार के लेखापाल बीएन लालदास का ऐसा एक बयान छपा है.
उन्होंने कहा है कि यदि मैं सरकारी गवाह बन जाता तो मुझे मरवा दिया जाता. याद रहे कि सीबीआई उन्हें सरकारी गवाह बनने के लिए कह रही थी. क्या आज जेल में बंद लोग अपने अपने कर्मों के लिए अब भी प्रायश्चित करेंगे? क्या वे अब भी यह महसूस करेंगे कि उन पत्रकारों की चेतावनियों पर उन्होंने ध्यान दिया होता तो इस हालत में वे नहीं पहुंचते?
संवैधानिक कर्तव्य : अनेक लोग समय-समय पर शासन से यह मांग करते रहते हैं कि उन्हें उनके संवैधानिक अधिकार मिलने ही चाहिए. ऐसी मांग सही भी है. पर, कितने लोगों को यह पता है कि भारत के संविधान में अधिकारों के साथ-साथ नागरिकों के लिए कुछ कर्तव्यों का भी प्रावधान मौजूद है?
उनका कितना पालन हो रहा है? गणतंत्र दिवस के अवसर पर उन मूल कर्तव्यों का विवरण यहां दिया जा रहा है. वैसे भी इन्हें पढ़कर हम इस नतीजे पर आसानी से पहुंच सकते हैं कि इन प्रावधानों का कितना पालन हो रहा है! यदि नहीं हो रहा है कि इसके लिए क्या करना चाहिए. संविधान के अनुच्छेद – 51 में दस मूल कर्तव्यों का विवरण इस प्रकार है-
1 -भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान का आदर करें. 2-स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोय रखे और उसका पालन करें. 3-भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखें.
4- देश की रक्षा करें और आह्वान किये जाने पर राष्ट्र की सेवा करें. 5-भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भातृत्व की भावना का निर्माण करें जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हों, ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के खिलाफ हैं. 6-हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझें और उसका संरक्षण करें. 7-प्राकृतिक पर्यावरण को जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करें और उसका संवर्धन करें तथा प्राणीमात्र के प्रति दया भाव रखें.
8-वैज्ञानिक दृष्टिकोण ,मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें. 9-सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें. 10-व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नयी ऊंचाइयों को छू ले.
अभिभावक का इंटरव्यू जरूरी : जब कुछ निजी स्कूलों के प्रबंधन बच्चों के दाखिले से पहले उनके अभिभावकों से बातचीत करते हैं तो कुछ लोग उसकी हंसी उड़ाते हैं. पर देश में हो रही हाल की कुछ घटनाएं उसकी जरूरत बता रही हैं. कुछ अल्पवय किंतु उदंड छात्र अपने सहपाठी की हत्या कर देते हैं तो कुछ अन्य छात्र अपने शिक्षक को ही गोली मार देते हैं. दरअसल स्कूल स्तर के लड़कों की ऐसी उदंडता के पीछे आम तौर गार्जियन की लापारवाही जिम्मेदार बतायी जाती है.
किसी भी अच्छे स्कूल के होशियार प्राचार्य व प्रबंधन के सदस्य अधिकतर अभिभावकों से कुछ ही मिनटों की बातचीत के बाद ही यह बता सकते हैं कि वे अपने बच्चों को कितना समय देते होंगे या अनुशासित रखते होंगे. या फिर उनका खुद का स्वभाव कैसा है. उनके बेशुमार धन का कैसा असर उनके बच्चों पर पड़ रहा होगा.
और अंत में : बात उन दिनों की है जब बिन्देश्वरी दुबे बिहार की कांग्रेसी सरकार के मुख्यमंत्री थे. एक नेता ने कर्पूरी ठाकुर पर तरह-तरह के आरोप लगाते हुए उन दिनों कहा था कि ‘कर्पूरी दुबे का दलाल और राजनीतिक तस्कर है.’
उसी नेता का आज गुरुवार के अखबार में एक बयान आया है. उन्होंने कहा है कि ‘कर्पूरी जी समाजवादी विचारधारा के लेनिन थे.’ इसे कर्पूरी ठाकुर की राजनीतिक शैली की नैतिक जीत ही तो कही जायेगी.
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