Nawada News : नवादा कहते हैं कि न्याय में देर है, अंधेर नहीं. लेकिन नवादा की एक अदालत में पेश हुआ 28 साल पुराना मामला इस कहावत पर गंभीर सवाल खड़े करता है. यहां मुकदमे की सुनवाई में इतनी लंबी देरी हुई कि केस के कई महत्वपूर्ण रिकॉर्ड ही गायब हो गये. मामला राज्य बनाम बिनोद कुमार जी व अन्य, काशीचक थाना कांड संख्या 55/1998, जीआर संख्या 1421/1998 से जुड़ा है. सिविल कोर्ट, नवादा के जेएमएफसी-सह-एएम संतोष कुमार की अदालत ने 8 जुलाई 2026 को इस मामले में आदेश पारित किया. आदेश में केस के पुराने रिकॉर्ड और केस डायरी के उपलब्ध नहीं होने की स्थिति सामने आयी है.
1998 से 2011 तक के आदेश केस फाइल से गायब
अदालत ने अपने आदेश में उल्लेख किया है कि वर्ष 1998 से 2011 के बीच इस मामले में पारित किये गये आदेश केस फाइल में उपलब्ध नहीं हैं. आपराधिक मुकदमे में महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जाने वाली केस डायरी भी रिकॉर्ड से गायब है. केस डायरी उपलब्ध नहीं होने के कारण अदालत के लिए यह जानना भी मुश्किल है कि पुलिस ने मामले की जांच किस तरह और किन परिस्थितियों में की थी.
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15 साल बाद भी रिकॉर्ड रूम से नहीं मिली मूल फाइल
अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, 24 सितंबर 2011 को फरार आरोपियों का रिकॉर्ड अलग कर मूल रिकॉर्ड रिकॉर्ड रूम से मंगाने का आदेश दिया गया था. इसके बावजूद करीब 15 वर्ष बीत जाने के बाद भी मूल फाइल रिकॉर्ड रूम से अदालत में उपलब्ध नहीं करायी जा सकी. इस स्थिति ने मामले की सुनवाई को आगे बढ़ाने में गंभीर बाधा उत्पन्न कर दी.
अधूरे रिकॉर्ड के साथ मुकदमा लंबित रखने का नहीं कोई उद्देश्य
अदालत ने मामले में टिप्पणी की कि अधूरे और खंडित रिकॉर्ड के साथ मुकदमे को लंबे समय तक लंबित रखने का कोई फलदायी उद्देश्य नहीं है. इसी वजह से अदालत ने मुकदमे को ‘साइन डाई’ (Sine Die) पर स्थगित कर दिया. इसका अर्थ है कि मामले को फिलहाल अनिश्चितकाल के लिए स्थगित रखा गया है.
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बरी नहीं हुए आरोपी, रिकॉर्ड मिलने पर फिर शुरू हो सकता है केस
‘साइन डाई’ का आदेश आरोपियों के बरी होने या मुकदमे के समाप्त होने का आदेश नहीं है. अदालत के अनुसार, मूल रिकॉर्ड और केस डायरी उपलब्ध होने पर या किसी पक्ष की ओर से आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत किये जाने पर मामले को फिर से सुनवाई के लिए लिया जा सकता है. यानी मुकदमा समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि फिलहाल रिकॉर्ड के अभाव में उसकी कार्यवाही रोक दी गयी है.
28 साल पुराने मामले ने रिकॉर्ड व्यवस्था पर उठाये सवाल
वर्ष 1998 में दर्ज हुआ मुकदमा 2026 तक पहुंच गया, लेकिन महत्वपूर्ण दस्तावेजों के उपलब्ध नहीं होने के कारण इसकी सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी. इस मामले ने न्यायिक एवं पुलिस रिकॉर्ड के संरक्षण और संधारण की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं. सवाल यह भी है कि यदि किसी मुकदमे की केस डायरी और पुराने आदेश ही रिकॉर्ड से गायब हो जाएं, तो पीड़ित पक्ष और न्यायिक प्रक्रिया पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा. अब इस मामले में मूल रिकॉर्ड और केस डायरी की उपलब्धता ही आगे की न्यायिक कार्रवाई का आधार बनेगी.
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