जंगल में लकड़ियां बेचकर पेट की जुगाड़ करते हैं आदिवासी
जंगल में लकड़ियां बेचकर पेट की जुगाड़ करते हैं आदिवासीफोटो संख्सा:12-लकड़ी बेचने जाता आदिवासी प्रतिनिधि, कजराकजरा क्षेत्र के आदिवासी जीविकोपार्जन के लिये पूरी तरह जंगल पर निर्भर हैं. घोघरघाटी, हनुमानथान, सिमरातरी, कानीमोह, शीतला, दुधम आदि दर्जनों आदिवासी बहुल गांव के लोग अपने पेट की आग बुझाने के लिये जंगलों पर निर्भर रहते हैं. जंगल से […]
जंगल में लकड़ियां बेचकर पेट की जुगाड़ करते हैं आदिवासीफोटो संख्सा:12-लकड़ी बेचने जाता आदिवासी प्रतिनिधि, कजराकजरा क्षेत्र के आदिवासी जीविकोपार्जन के लिये पूरी तरह जंगल पर निर्भर हैं. घोघरघाटी, हनुमानथान, सिमरातरी, कानीमोह, शीतला, दुधम आदि दर्जनों आदिवासी बहुल गांव के लोग अपने पेट की आग बुझाने के लिये जंगलों पर निर्भर रहते हैं. जंगल से मिलनेवाली जड़ी-बूटी के अलावे लकड़ियों को बेचकर आदिवासी अपने परिवार के लिये दो जून की रोटी का जुगाड़ करते हैं. रोजी-रोजगार के लिये पूरी तरह जंगल पर उनकी निर्भरता के कारण ये जंगल की हिफाजत भी करते हैं. कई आदिवासी परिवार पत्तल, दातुन आदि बेचकर भी अपना पेट पालते हैं. श्री किशुन पंचायत के उप मुखिया राजेंद्र कोड़ा, बुधैली बनकर पंचायत के महावीर कोड़ा आदि के मुताबिक आज भी आदिवासी समाज के लोगों की निर्भरता जंगलों पर काफी अधिक है. शिक्षा, स्वास्थ्य व मुलभूत सुविधाओं के अभाव में आदिवासी गांव में रहने वाले लोगों की जिंदगी आधुनिक बदलाव से पूरी तरह अछूता है. समाज के लोगा आज भी पाषाणकालीन जिंदगी जी रहे हैं.
