भूखे पेट काटी रातें, सहीं अंग्रेजों की यातनाएं... गया जी के इस स्वतंत्रता सेनानी की कहानी जान रो देंगे आप...

शेरघाटी के स्वतंत्रता सेनानी भवानी दत्त पाठक ने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. जेल की अमानवीय यातनाएं भी उनके हौसले को नहीं तोड़ सकीं. उनकी देशभक्ति आज भी प्रेरणा का स्रोत है.

Freedom Fighter Bhavani Dutt Pathak : भारत की आजादी की लड़ाई में बिहार के गया जी जिले का अहम योगदान रहा है. यहां की शेरघाटी की ऐतिहासिक धरती ने देश को कई ऐसे वीर स्वतंत्रता सेनानी दिए हैं, जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. इन्हीं महान सपूतों में से एक थे भवानी दत्त पाठक, जिनकी राष्ट्रभक्ति, अदम्य साहस और संघर्ष की कहानी आज भी लोगों के रोम-रोम में ऊर्जा भर देती है.

देवी मठ के पास बीता था बचपन

शेरघाटी के हटिया मुहल्ला स्थित देवी मठ के समीप रहने वाले भवानी दत्त पाठक बचपन से ही देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत थे. युवावस्था में कदम रखते ही उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चल रहे आंदोलनों में अपनी सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी थी. देश को आजाद कराने की इस धुन में उन्होंने अपनी जवानी का एक बड़ा और महत्वपूर्ण समय जेल की सलाखों के पीछे गुजार दिया.

बरगद के पेड़ के नीचे बनती थी रणनीति

परिजनों और जानकारों के अनुसार, उस दौर में शेरघाटी के रंगलाल स्कूल के बाहर एक विशाल बरगद का पेड़ हुआ करता था. इसी पेड़ के नीचे बैठकर युवा क्रांतिकारी आजादी की गुप्त रणनीतियां तैयार करते थे. स्वतंत्रता सेनानी जगलाल महतो के कुशल नेतृत्व में भवानी दत्त पाठक और उनके अन्य युवा साथियों ने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का कड़ा संकल्प लिया था.

गांधी जी के आंदोलनों में निभाई सक्रिय भूमिका

भवानी दत्त पाठक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों और उनके असहयोग आंदोलन से बहुत गहराई तक प्रेरित थे. इसी प्रेरणा के बल पर वे आजादी के महासमर में कूद पड़े. उन्होंने वर्ष 1930 के ऐतिहासिक सत्याग्रह के साथ-साथ 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' में भी पूरे दमखम के साथ हिस्सा लिया और अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया.

जेल की अमानवीय यातनाएं भी नहीं तोड़ सकीं हौसला

अंग्रेजी सरकार ने उनके विद्रोही तेवर को देखते हुए उन्हें दो बार गिरफ्तार किया. जेल में उन पर जुल्म ढाए गए और अमानवीय यातनाएं दी गईं. कई बार तो ऐसा हुआ कि उन्होंने बिना भोजन और पानी के कई-कई रातें गुजारीं. इसके बावजूद उनका मजबूत मनोबल कभी नहीं टूटा और वे देश की आजादी के अपने पवित्र संकल्प से एक इंच भी पीछे नहीं हटे.

तीन वर्ष जेल में रहने के बाद हुई थी शादी

अंग्रेजों की कैद में करीब तीन वर्ष तक कठोर यातनाएं सहने के बाद जब वे अपने घर लौटे, तब जाकर उनका वैवाहिक जीवन शुरू हुआ. उनका विवाह गया की ही रहने वाली अन्नपूर्णा पाठक के साथ संपन्न हुआ. भवानी दत्त पाठक के रिश्तेदार और सेवानिवृत्त शिक्षक विजय दत्त पाठक फख्र के साथ बताते हैं कि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से ज्यादा तरजीह हमेशा देश की स्वतंत्रता को दी.

साथियों के साथ मिलकर लिखा इतिहास

इस कठिन लड़ाई में भवानी दत्त पाठक अकेले नहीं थे. उनके साथ बीटी बीघा के कई जांबाज साथियों ने भी कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया. इनमें बच्चू सिंह, फिरंगी सिंह, बिंदेश्वरी सिंह, बलभद्र सिंह और भून सिंह जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं, जिन्होंने शेरघाटी का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा दिया.

आज भी प्रेरणास्रोत हैं सेनानी

आजादी के 79 वर्ष बीत जाने के बाद भी शेरघाटी के लोग भवानी दत्त पाठक के भारी त्याग, अदम्य साहस और बलिदान को बड़े ही गर्व के साथ याद करते हैं. उनका यह जीवन इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि हमें यह स्वतंत्रता आसानी से नहीं मिली है. युवा पीढ़ी को उनके इतिहास से रू-ब-रू कराने के लिए स्थानीय स्तर पर प्रशासन और समाज को उनके स्मारक और जीवनी के संरक्षण की दिशा में आगे कदम बढ़ाना चाहिए.

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By Prabhat khabar news desk

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