गया जी : बोरवेल में गिरने के बाद भी हाथ से नहीं छोड़ा मोबाइल, NDRF ने ‘अंकुशी’ तकनीक से बचाई जान

गया में 30-35 फुट गहरे बोरवेल में गिरे 5 साल के पीयूष का NDRF ने रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया. करीब एक घंटे की मशक्कत के बाद 'अंकुशी' तकनीक का इस्तेमाल कर बच्चे को सुरक्षित बाहर निकाला गया. पीयूष पूरे समय अपने मोबाइल से चिपका रहा.

Gaya Ji News : बोरवेल में गिरे मासूम के रेस्क्यू ऑपरेशन की रोमांचक कहानी सामने आयी है. एनडीआरएफ की टीम ने करीब एक घंटे की कड़ी मशक्कत और सूझबूझ के बाद बच्चे को सुरक्षित बाहर निकाला है. इससे पहले गुरुवार की शाम करीब 6.28 बजे पीयूष मोबाइल देखते-देखते अपनी मां के साथ जा रहा था. इसी दौरान प्लास्टिक के बोरे पर जैसे ही पीयूष का पैर पड़ा, वह सीधे 30 से 35 फुट गहरे गड्ढे में नीचे जाकर फंस गया. हालांकि, पीयूष ने मोबाइल नहीं छोड़ा. जैसे ही पीयूष गड्ढे में गिरा, उसकी मां ने शोर मचाया.

शोर सुनकर मौके पर सैकड़ों की तादाद में घटनास्थल पर ग्रामीण जुट गये. मौके पर जुटे ग्रामीणों को समझ में नहीं आ रहा था कि पीयूष को गड्ढे से कैसे बाहर निकाला जाये. इसके बाद इसकी सूचना गुरपा थानाध्यक्ष शिवनंदन कुमार, फतेहपुर अंचलाधिकारी अमिता सिन्हा और बीडीओ शशि भूषण साहू को दी गयी.

300 फुट गहरे बोरवेल में एक बच्चे के अटके रहने की बात सामने आते ही स्थानीय प्रशासनिक अमला पूरी तरह सतर्क होते हुए घटनास्थल की ओर रवाना हो गया. मौके पर जेसीबी मंगाकर बोरवेल के इर्द-गिर्द खुदाई शुरू कर दी गई, हालांकि इसमें काफी खुदाई होने के बाद भी पीयूष के पास पहुंचना मुश्किल लगा.

पटना के बिहटा से 155 किलोमीटर का सफर तय कर रात 12 बजे पहुंची एनडीआरएफ

इधर, घटना के करीब 1 घंटे बाद ही वजीरगंज कैंप डीएसपी सुनील कुमार पांडे एसडीआरएफ की टीम लेकर गया से घटनास्थल पर पहुंचे. एसडीआरएफ की टीम भी पीयूष को निकालने में असमर्थ दिखी, जिसके बाद इसकी सूचना एनडीआरएफ टीम को दी गयी.

एनडीआरएफ के अधिकारियों ने बताया कि उन्हें करीब आठ बजे रात में घटना की जानकारी दी गयी थी. वे पटना के बिहटा से करीब 155 किलोमीटर का सफर तय करते हुए घटनास्थल पर रात 12 बजे पहुंचे और तत्काल राहत और बचाव कार्य शुरू कर दिया. शुरुआत में टीम ने पाइप के जरिए बच्चे को बाहर निकालने की कोशिश की, लेकिन बोरवेल की बनावट के कारण वह तरीका कारगर साबित नहीं हुआ.

'अंकुशी' तकनीक का हुआ इस्तेमाल, कपड़ों में हुक फंसाकर खींचा गया बाहर

इसके बाद एनडीआरएफ के जवानों ने एक विशेष तकनीक का इस्तेमाल किया. जवानों के पास एक खास हुकनुमा डिवाइस (जिसे स्थानीय भाषा में 'अंकुशी' कहा जाता है) था, जिसका उपयोग अक्सर मलबे या तंग जगहों में फंसे कपड़ों को फंसाकर खींचने के लिए किया जाता है. जवानों ने इस डिवाइस को बोरवेल में डाला, जो नीचे जाकर बच्चे के कपड़ों में सुरक्षित रूप से फंस गया. इसके बाद बेहद सावधानी से धीरे-धीरे खींचकर बच्चे को ऊपर लाया गया.

बोरवेल से निकलने के बाद पीयूष की पहली तस्वीर

बड़की मम्मी की आवाज सुन मिली हिम्मत, आखिरी पलों में छूटा मोबाइल

रेस्क्यू के दौरान बच्चा भयभीत नजर नहीं दिखा. वह पूरे समय मोबाइल को हाथ में ही रखे रहा. एनडीआरएफ के जवानों ने पहले बच्चे को खुद हाथ पकड़ने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन जब बच्चा मोबाइल छोड़कर हाथ पकड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ, तो उसकी बड़की मम्मी को बुलाया गया. उन्होंने बोरवेल के मुंह के पास आकर आवाज लगाई और कहा, "बेटावा पकड़ ले बाबू, तुमको बिस्कुट देंम." अपनों की आवाज सुनकर बच्चे को हिम्मत मिली, लेकिन उसने मोबाइल नहीं छोड़ा और सिर्फ अपनी बड़की मम्मी से पानी की मांग की.

उसके बाद एनडीआरएफ ने अपने कौशल का परिचय देते हुए रेस्क्यू को अंजाम दिया. जैसे ही एनडीआरएफ की टीम ने पीयूष को गड्ढे से सुरक्षित निकाला, वैसे ही पूरा क्षेत्र भारत माता की जय और एनडीआरएफ की जय-जयकार के नारों से गूंज उठा.

बोरवेल की बनावट ने बचाई जान, व्यास के अंतर के कारण अटक गया था शरीर

इस हादसे के पीछे बोरवेल की बनावट और सुरक्षा में बरती गई लापरवाही सबसे बड़ा कारण रही. आमतौर पर बोरवेल की बोरिंग करते समय ऊपरी हिस्से का व्यास (मुंह) लगभग 10 इंच का होता है. जैसे-जैसे गहराई बढ़ती है, नीचे की चौड़ाई कम होती जाती है और यह घटकर 6 से 7 इंच तक रह जाती है. बोरवेल का ऊपरी हिस्सा 10 इंच चौड़ा होने के कारण बच्चा उसमें आसानी से नीचे गिर गया.

लेकिन, नीचे जहां व्यास घटकर 6 इंच रह गया था, वहां बच्चे का शरीर जो कि 6 इंच से थोड़ा चौड़ा था, जाकर अटक गया. इसी वजह से वह और ज्यादा नीचे नहीं गिरा, जिससे उसकी जान बच सकी. एक और दिलचस्प वाकया यह रहा कि बच्चा जब बोरवेल में गिरा, तो उसके हाथ में एक मोबाइल फोन था. वह पूरे रेस्क्यू के दौरान मोबाइल हाथ में थामे रहा, लेकिन जैसे ही उसे सुरक्षित बाहर निकाला जा रहा था, आखिरी पलों में मोबाइल हाथ से छूटकर बोरवेल के गहरे तल में चला गया.

मेडिकल टीम की दिखी लापरवाही, ग्रामीण चिकित्सकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने निभाया फर्ज

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान एक तरफ जहां सरकारी सिस्टम की सुस्ती दिखी, वहीं स्थानीय ग्रामीण चिकित्सकों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने देवदूत बनकर मदद की. मौके पर जब ऑक्सीजन सिलेंडर खाली मिला, तो ग्रामीण चिकित्सक अजीत कुमार और पप्पू कुमार ने तुरंत नए सिलेंडर की व्यवस्था की और बच्चे तक ऑक्सीजन पहुंचाने में मदद की.

इधर, सामाजिक कार्यकर्ता समर राठौर ने लगातार जिले के वरीय पदाधिकारियों से संपर्क कर घटनास्थल पर राहत और बचाव दल को मौके पर बुलाने का काम किया. वहीं, नरेश भारती और रणजीत साव को मौके पर पानी, रस्सी सहित अन्य आवश्यक उपकरणों की लगातार व्यवस्था करते देखा गया.

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