Darbhanga News: अर्थ ओवरशूट डे के अवसर पर राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र में गुरुवार को "प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण एवं सतत जीवनशैली" विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई. कार्यक्रम में वैज्ञानिकों एवं कर्मचारियों ने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सतत विकास के प्रति सामूहिक संकल्प लिया.
सीमित संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की जरूरत
मुख्य वक्ता वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार ने कहा कि पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, जबकि मानव की उपभोग प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है. उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों पर असीमित उपभोग संभव नहीं है और यदि समय रहते जीवनशैली में बदलाव नहीं किया गया तो भविष्य में गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है.
उन्होंने बताया कि पृथ्वी एक वर्ष में जितने संसाधनों का पुनर्जनन कर सकती है, मानवता उनका उपयोग केवल सात महीनों में ही कर चुकी है. ऐसे में शेष अवधि के लिए भविष्य की पीढ़ियों के हिस्से के संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता है.
भारत में बढ़ रहा पर्यावरणीय दबाव
डॉ. मनोज कुमार ने कहा कि वर्तमान में मानवता पृथ्वी की पुनर्जनन क्षमता से लगभग पौने दो गुना अधिक संसाधनों का उपयोग कर रही है. उन्होंने बताया कि इस वर्ष भारत का संसाधन घाटा दिवस (Earth Overshoot Day for India) 17 अप्रैल को ही आ गया था, जो बढ़ते पर्यावरणीय दबाव का संकेत है.
ऊर्जा और जल संरक्षण अपनाने की अपील
उन्होंने ऊर्जा एवं जल संरक्षण, सार्वजनिक परिवहन के अधिक उपयोग, वृक्षारोपण तथा कम संसाधन-आधारित कृषि प्रणालियों को अपनाने की अपील की. साथ ही बताया कि पिछले एक वर्ष में पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों से वृक्षों की संख्या में वृद्धि और बिजली की खपत में कमी दर्ज की गई है.
संगोष्ठी में वैज्ञानिक एस.एम. राउत, डॉ. वी.के. पडाला, डॉ. धर्मेंद्र, ई. आर.के. राउत, डॉ. एस.बी. तराटे, अशोक कुमार, धीरज प्रकाश, आलोक कुमार सहित अन्य वैज्ञानिक एवं कर्मचारी उपस्थित रहे.
