Buxar News: श्री हरि ने देवर्षि नारद के काम विजय अभिमान को किया चूर

यहां के ऐतिहासिक किला मैदान में श्री रामलीला समिति के तत्वाधान में चल रहे 22 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के दौरान दूसरे दिन सोमवार को श्री कृष्ण जन्म और नारद मोह लीला का मंचन किया गया.

बक्सर. यहां के ऐतिहासिक किला मैदान में श्री रामलीला समिति के तत्वाधान में चल रहे 22 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के दौरान दूसरे दिन सोमवार को श्री कृष्ण जन्म और नारद मोह लीला का मंचन किया गया. वृंदावन के सुप्रसिद्ध श्री राधा माधव रासलीला एवं रामलीला संस्थान के स्वामी श्री सुरेश उपाध्याय “व्यास जी ” के निर्देशन में कलाकारों ने दिन में श्रीकृष्णलीला व रात में श्रीरामलीला के उक्त प्रसंगों को जीवंत किया. जिसे का दीदार कर दर्शक भाव विभोर हो गए. जब विश्व मोहिनी पर मोहित हो गए देवर्षि नारद देर रात तक चले रामलीला प्रसंग के दौरान “नारद मोह लीला ” के चरित्र का मंचन किया गया. जिसमें दिखाया गया कि देवर्षी नारद जी हिमालय की कंदराओं मे समाधिस्थ हो तपस्या में लीन हैं. यह देख देवराज इंद्र का सिंहासन डोल पड़ता है और अपनी गद्दी को लेकर चिंतित हो जाते हैं. नारद जी के ध्यान भंग करने के लिए देवराज इंद्र कामदेव को उनके पास भेजते हैं. कामदेव समस्त कलाओं का प्रयोग करने के पश्चात भी नारद जी का ध्यान भंग नहीं कर पाते हैं और अंत में उनके चरणों में शरणागत हो याचना करने लगते हैं. नारद जी उन्हें क्षमा कर देते हैं, परंतु कामदेव को पराजित करने का उन्हें दंभ हो जाता है कि मैंने काम और क्रोध दोनों को जीत लिया है. वे अभिमान से वशीभूत होकर यह बात ब्रह्मा जी, शंकर जी से बताते हुए भगवान विष्णु के पास पहुंच जाते हैं. उनके अभिमान को देख प्रभु माया रूपी नगर की रचना करते हैं. उस माया रूपी नगरी में विश्व मोहिनी नामक सुंदर युवती को देख नारद जी मोहित हो जाते हैं और उससे विवाह करने के लिए श्री हरि से सुंदर स्वरूप के लिए याचना करते हैं. इसपर भगवान उन्हें बंदर का रूप प्रदान कर दे देते हैं. स्वयंवर में यह देख कर सभी लोग नारद जी का उपहास करते हैं. जिससे नारद जी क्रोध में आकर नारायण को पृथ्वी पर आने का श्राप देते हैं. कारागार में हुआ श्रीकृष्ण का जन्म जिसमें दिखाया गया कि मथुरा के राजा कंस अपनी बहन देवकी का विवाह वासुदेव से कराता है. जब कंस अपनी बहन देवकी को विदा करने जा रहा था तो मार्ग में आकाशवाणी हुई, तू जिस देवकी को विदा करने जा रहा है उसका “आठवां पुत्र ” तेरा काल होगा. यह सुनकर कंस अपनी बहन को मारने के लिए दौड़ पड़ता है. परंतु उग्रसेन के विरोध के पश्चात वासुदेव देवकी को कारागार में डाल स्वयं मथुरा का राजा बन बैठता है. देवकी का प्रथम पुत्र हुआ तो कंस ने उसे वापस कर देता है. तभी नारद जी पहुंच जाते हैं और वे उसे समझाते हैं कि आठवां पुत्र ऊपर या नीचे की गिनती से कोई भी हो सकता है, तब कंस ने देवकी के छ: संतानों को मार देता है. सातवां पुत्र गर्भ में ही नष्ट हो जाता है. आठवें पुत्र के रूप में “श्री कृष्ण ” का जन्म होता है. वासुदेव उन्हें रात्रि में ही यमुना पार गोकुल में नंद-यशोदा के यहां पहुंचा देते हैं. मौके पर समिति के पदाधिकारियों में समिति के सचिव बैकुंठ नाथ शर्मा सहित अन्य सदस्य एवं कार्यकर्ता मौजूद थे. |

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