ऐतिहासिक नगरी राजगीर को उसके प्राचीन नाम ‘राजगृह’ की पहचान दिलाने की पहल 16 महीने बाद भी सरकारी प्रक्रिया की दहलीज तक नहीं पहुंच सकी है. नगर परिषद की सामान्य बोर्ड बैठक में सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव अबतक फाइलों में ही सिमटा हुआ है. प्रस्ताव को जिला प्रशासन के माध्यम से संबंधित उच्च स्तर तक भेजने की कार्रवाई नहीं होने से शहरवासियों में नाराजगी के साथ यह सवाल भी उठने लगा है कि आखिर बोर्ड के निर्णय पर अमल कब होगा.
28 मई 2025 को को हुई थी नगर परिषद की बैठक
सूत्रों के अनुसार, 28 मई 2025 को सांसद कौशलेन्द्र कुमार की मौजूदगी में नगर परिषद की सामान्य बोर्ड की बैठक हुई थी. इसी बैठक में तत्कालीन सशक्त स्थायी समिति सदस्य एवं वरीय वार्ड पार्षद डॉ. अनिल कुमार ने राजगीर का नाम बदलकर उसके प्राचीन नाम ‘राजगृह’ करने का प्रस्ताव सदन में रखा था. प्रस्ताव पर सदस्यों ने ध्वनि मत से सहमति जतायी थी. इसके बाद माना जा रहा था कि नगर परिषद आवश्यक प्रक्रिया पूरी करते हुए प्रस्ताव को जिला प्रशासन के माध्यम से पटना प्रमंडलीय आयुक्त और मंत्रिमंडल सचिवालय तक भेजेगी.
16 महीने में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ी प्रक्रिया
बोर्ड की बैठक में प्रस्ताव पारित हुए 16 महीने बीत चुके हैं। लेकिन अबतक इसे डीएम तक नहीं पहुंचाया गया है. पटना प्रमंडलीय आयुक्त और मंत्रिमंडल सचिवालय को भी प्रस्ताव नहीं भेजा गया है. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव को आगे बढ़ाने में इतनी लंबी देरी क्यों हुई? क्या नगर परिषद की बोर्ड बैठक का निर्णय केवल कार्यवाही पुस्तिका तक ही सीमित रहता है.
राजगृह केवल नाम नहीं, इतिहास की पहचान
शहरवासियों और इतिहास-संस्कृति प्रेमियों का कहना है कि ‘राजगृह’ राजगीर के अतीत की महज एक संज्ञा नहीं, बल्कि इसकी हजारों वर्ष पुरानी ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है. प्राचीन काल में राजगृह मगध की राजधानी रहा है। बौद्ध और जैन परंपराओं में भी इसका व्यापक उल्लेख मिलता है. राजगीर के विभिन्न जैन प्रतिष्ठानों के साइनबोर्ड से लेकर ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थलों तक ‘राजगृह’ नाम आज भी दिखाई देता है.
सरकारी नामकरण में भी जीवित है ‘राजगृह’
डॉ अनिल कुमार और महेन्द्र यादव ने कहा कि ऐतिहासिक ग्रंथों और धार्मिक परंपराओं में राजगीर का उल्लेख ‘राजगृह’ के रूप में मिलता है. सरकार द्वारा निर्मित ‘राजगृह अतिथि गृह’ और ‘गंगाजी राजगृह जलाशय’ जैसे नाम भी इस प्राचीन पहचान को दर्शाते हैं. राजगीर के पुरातात्विक स्थलों के साइनबोर्ड पर भी ‘राजगृह’ नाम अंकित है.
